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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 315 में से

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पृष्ठ 26

– १८ –
इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि 'बीसलदेव रासो' की प्रतियों के दो
रूपान्तर हैं।$^१$ एक तो वह जो चार खण्डों में विभक्त है और दूसरा वह जिसमें
खंडों का विभाजन नहीं है। इन रूपान्तरों में उपर्युक्त भिन्नता के अतिरिक्त
और भी कुछ विशेष बातें द्रष्टव्य हैं।
दोनों रूपान्तरों की कुछ विशेषताएँ
खण्डों में विभाजित प्रतियाँ:-- खण्डों में अविभाजित प्रतियाँ :—
(१) कथा चार खण्डों में समाप्त (१) केवल तीन खण्डों की कथा ही
होती है। प्राप्य है।
(२) माघ, कालिदास आदि पंडितों (२) इन नामों का अभाव है।
का नाम आता है।
(३) उड़ीसा यात्रा में साथ जाने (३) इन नामों का उल्लेख नहीं है।
वाले सरदारों के नाम गिनाये
गए हैं।
(४) राजा के उड़ीसा जाने का मुहूर्त (४) रानी ज्योतिषी से चार माह
रानी ज्योतिषी से एक माह बाद बाद का मुहूर्त राजा को देने के
कर देने को कहती है। लिए कहती है।
(५) वर खोजने के लिए जैसलमेर (५) यह वर्णन इस रूपान्तर की
आदि जाने का विस्तृत वर्णन है। प्रतियों में विस्तार से नहीं है।
(६) इस रूपान्तर की प्रतियों में (६) इस रूपान्तर में ग्रन्थ के शेष में
रचनाकाल-सूचक पद्य ग्रन्थ रचना-सूचक पद्य आया है।
के आदि में है।
ऊपर प्राप्य हस्तलिखित प्रतियों का विभाजन काल के अनुसार चार समूहों
में किया गया है। प्रत्येक समूह की प्रत्येक प्रति उपर्युक्त दोनों रूपान्तरों में से
किस रूपान्तर में आती है उसे निम्न रूप में स्पष्ट किया जा सकता है :—
समूह खण्डों में अविभाजित खण्डों में विभाजित
'अ' संख्या १, ३, ४, संख्या २
'आ' " ५, ७, ८, ९ " ६,
१०, ११, १२, १३,
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(१) राजस्थानी—३रा भाग, अंक २, पृ०-१८।