बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें~ १६८ ~
चार चरण उलग हुया।
था$^१$ परि आव्या ही$^२$ पीथल राठ$^३$ ॥१८५॥
सब आपयड$^४$ थभग लीपट बोझाइ।
भानमती राखी लियठ वधाइ ॥
सरस बचन धण पोखीया।
सब पडियट्ट$^५$ बात कही समझाइ ॥
भाट सारंग को चउरी चड्यउ$^६$।
उतउ उलगायउ देउरो घरह चंदाइ ॥१८६॥
पहिम पटकि मेपडा पढदार।
आंगण भाट करइ जह कार$^७$ ॥
भट भाटिक दीसइ घणा।
उमिरह$^८$ औवोहन दीसइ दरबारि ॥
भीतरि जाइ सुणानीयउ$^९$।
थारी बहिनडी$^{१०}$ कोकहू$^{११}$ राजदुवारि ॥१८७॥
१ आ० ६ था।
२ आ० ६ आयो, आ० १२ आव्या थी।
३ आ० १२ राइ।
यह छंद आ० ६ में १८७ तथा आ० १२ में १७० है।
४. आ० १२ आये।
५. आ० १२ पडियै।
६. आ० १२ चोरी चड्यो।
यह छंद आ० ६ में १८८ तथा आ० १२ में १७१ है।
लेकिन आ० १२ में अंतिम पंक्ति है -
"उलगाणो देल्यो घरा पठाइ।"
७ आ० १२ जयकार। ८ आ० १२ (में नहीं है)।
९ आ० १२ सुणाईयो। १० आ० १२ बहिन।
११ आ० ६ कोक्यो, आ० १२ तू कोकियो।
यह छंद आ० ६ में १८६ तथा आ० १२ में १७२ है।