बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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किण^१ ढण्हारा^२ सारिपठ^३ ।
ग्हारा ख्युटा देवर कह अणुहार ॥
इन्द गोरो पीयब राजउठ ।
उचट जोयां^४ कहि जमदाड़ ॥
डरि जाउठ कहि पातखाउ ।
द्वादस तिलक करह^५ नवहू^६ विहाइ ॥
खापा^७ मांहि^८ पिलाखि नह^९ ।
पंडिया म्हारा^१० प्रोतण^११ पृंढा^१२ सदिंगाण^१३ ॥५५॥
१. आ० ६ कुण, आ० १२ किसि ।
२. आ० ६ अणुहार, आ० १२ उविहारा ।
३. अ० २ कीण सारिखो, आ० ६ कुण सारिखो ।
४. अ० २ ऊँचउ गोरुउ, आ० ६ ऊँचो गोरो ।
५+६ अ० २ उगउइ, आ० ६ करिडठाइ, आ० १२ करै नवइ ।
७+८+६. आ० ६ खाप म्हील्याणादि लप लहइ ।
१०+११. अ० २ म्हा को प्रीयछह, आ० ६ मीड म्हारो, आ० १२
म्हारा त्रिउका ।
१२+१३. अ० २ इणतो सहिणाय, आ० ६ एण सहिणाण, आ० १२
ए सहिनाण ।
यह छंद अ० २ खड ३ में ३५, आ० ६ खड ३ में ३२,
आ० १२ मे १५६ है । लेकिन अ० २ और आ० ६ में ६री पंक्ति
का पाठ है:—
' जाणी अदिनायद लेह पोद्वाणि ।' तथा इन दोनों प्रतियो के
बीच में दो पंक्तिया और हैं:—
"पाय ऋषीणी मो अथी ( आ० ६—मोजकी ) ।
मूल्ल ( भोटो-आ० ६ ) करिपाण है टावइ हाथि ॥
आ० १२ में ६ठी पंक्ति नहीं है । तथा ६वीं पंक्ति के बदले में है—
"राजा चढीपो हव नव लपै ।”