बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
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बंदिया आइ कहिं पय वर मादह१।
तहू मोहू दीन्दी२ भी लीलनी वाद ॥
पद सूरिज दुई मादीया३ ।
पवन पानी पर४ धावी धाहावि५ ॥
धूप अतसउ पड धसन्ना६ ।
१४ तट गूवा दीखानी लहर देखावि७ ॥१४५॥
साईं१० राज तडपा यह अडया - नीर ।
दह गुट्टी पहुँता समुंद दह पोरि ॥
यह कदी कामची मालदल११ ।
एक रिसउ१२ स्वामी परह समात्रि ॥
पय थकि१३ पनुख१४ दुई रही।
बुल्लियानो त्रिम गफा१५ दाल ॥१४६॥
१ अ० २ पाणी वहह योग आ० ६ पांडीउ पदै ।
२. अ० २ मन की नाद ।
३ अ० २ ताया दाई थी, आ० ६ वि मादि दाधा ।
४ अ० २ चंद सूरिज दुह दीया सात ।
५ अ० २ पाणी पवन धरि, आ० ६ पाणी पवन नै ।
६ अ० २ धूप अफासि, आ० ६ धूप अफारा ।
७ अ० २ दोर पुजाइ थी बांमखे, आ० ६ द्रव्य पुनाय्यो बामखे ।
८+६ अ० २ मूसौ दे नग दल दुहथी विसास, आ० ६ मूसी दी नग
दल एणी वेशास ।
यह छंद अ० २ खंड ३ में ३१, आ० ६ खंड ३ में २६ है ।
तथा अ० २ में पंक्ति तीन और चार परस्पर स्थानान्तरित हैं एव
पाँचवी और छठी के बीच अतिरिक्त निम्न पंक्ति है —
"हूँ नवि जाणु महम करै।"
१०. आ० १२ स्वामी । ११ आ० १२ भोलय्या ।
१२ आ० १२ रसा । १३. आ० १२ पलि ।
१४ आ० १२ पजरि । १५. आ० १२ चंपिकी ।