बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
पृष्ठ 177, कुल 315 में से
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– ७१ –
वचन विरोधी¹ नीसरइ² ।
तितइ उकाहियउ आहूहोताइ ॥
उव तउ³ राषा⁴ न रहइ किमइ⁵ ।
ये तउ गोरडि रहउ समझा मन माहि ॥
धाइ⁶ दमोदर म्रीय समझाय⁷ ।
ग्रह पीडउ उलग जाइ ॥
विण दोषइ ग्रह पीडीय ।
ठव्य नहू चारमड थावर चारमड राह ॥
उभीय मेल्हनइ चाजी ।
रोवती छोडि घण घालीयउ नाद ॥
१-+२ आ० १२ विरोघो नीहरै ।
३ आ० १२ ( में नहीं है ) ।
४ आ० १२ राध्यो ।
५. अ० १२ काही, कउ नार हे ।
यह छंद आ० ६ में ११, आ० १२ में ६० है ।
इस छंद की अंतिम पंक्ति आ० १२ में है—
‘ते तो रहि हे गोरडी समझि मन माहि ।’
६ अ० २, आ० ६ शावि ।
७ अ० २, सद्सिनुपाठ, आ० ६ मैठो छइ पाठ ।
यह छंद अ० २ खड २ में २६, आ० ६ खड २ में २६, आ० ६
में १०१ है । लेकिन अ० २ और आ० ६ में, २ से ६ तक की पंक्तियां
इस प्रकार हैं:--
२ पहिन यौरा म्हाण पीड की मात ।
३. परी हो अपंग्यउ ( आ० ६ पीपाण ) उपरइ ।
४ आठमउ ठाँव रवि ( आ० ६ थावर ) पारमड राह ।
५ अहगण ( आ० ६ अहिगण ) अनिहि ( आ० ६ तिही ) मुरा ।
६ सिर घुणि गोरी मेल्हा राह ।