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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 315 में से

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पृष्ठ 154
  • ४८ -
    सांबरि¹ नीर रुधीर भरि ।
    पच्छदवामणि खण्ड नेह विश्राम² ॥ ६५ ॥
    चासउ उल्लग जाण न देइ³ ।
    ✓ बह्र मुक्त मारि कहू सरीसीय⁴ लेइ⁵ ॥
    अचल प्रह साधण⁶ कटइ⁷ ।
    हुइ दुप सालह हो सामीय साह ॥
    जोधन मुरडीय मारिस्या⁸ ।
    दोन रिसउ⁹ जइ¹⁰ साधण¹¹ वांस¹² ॥ ६६ ॥
    १ आ० ६ साभर । २. आ० १२ विश्राम ।
    यह छन्द आ० ६ में ६८ तथा आ० १२ में ६० है।
    इस छन्द की तीसरी पंक्ति आ० ६ में है—"नाल्ह रसायण इम भणै"
    तथा चौथी पंक्ति है—"मनहि उडि काटि तो फास"
    आ० १२ में चौथी पंक्ति है—"मनहि उफाटियो ना रहुमास"
    तथा पाँचवी पंक्ति है—"साभरि नीर न वीमरा"
    ३. अ० २ आ० ६ देहि ।
    ४. अ० २ साथ सु, आ० ६ मुक्त सरमी ।
    ५. अ० २ लेहि ।
    ६. आ० ६ अ० २ तै धन ।
    ७ अ० २, आ० ६ रही. आ० १२ कई ।
    ८. आ० ६ मारिज्यु, आ० १२ माग्म्यै ।
    ९. आ० ६ फमा को ।
    १०+११ आ० गोरदी को, आ० १२ राजा ।
    १२. आ० ६ नाह ।
    यह छंद अ० २ खड २ में ३२, आ० ६ खड २ में २६, आ० ६
    में ७० है । इस छंद की ४, ५, ६ठी पंक्तिया अ० २ में इस प्रकार हैं—
    ४ इक हवेली आरन पूर ।
    ५. सुनी सेज थीदेस पिउ ।
    ६. हुहुइ दुप नाल्ह कह दूगो कूण ।
    आ० १२ में पहिली पंक्ति है—चालस्या उलंगवण जाण न देइ ।
    आ० १२ में चौथी पंक्ति है—रोइ दुप सालै सामुही वाग्झ ।