बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)
Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans
नरपति नाल्ह द्वारा
पृष्ठ 151, कुल 315 में से
संदर्भ में पढ़ेंतिन गुनह बकसइ¹ स्वामी सइ कोड ।
सरथ ने फरडि² सु गुग्गु थीए³ छोड़ ॥
थे म्हा छीनड भरपमां⁴ ।
सहु सउ एक वच कहि बाली देहि ॥
लाजन करि कहइ कामिणी ।
किम उलग चाहइ अपज सनेह ॥ ६० ॥
उलग जाता जिम रहइ⁵ नारि ।
बोलिया⁶ बोलते⁷ चित्तइ⁸ विचार ॥
बोल्यउ हो पालयउ आपणउ ।
उतइ⁹ पांच उगहिस्या हीरा नी जाइ ॥
मुझ बिख किए तू जिनरहइ¹⁰ ।
बेगि¹¹ मिलिस्या मुझ नह याइ¹² ॥ ६१ ॥
१. आ० ६ स्वामी तीनि गुनह बकसइ, आ० १२ जगसै ।
२. आ० ६ करउ, आ० १२ फरहु ।
३ आ० १२ थी ।
४. आ० १२ भारपमा ।
यह छंद आ० ६ में ६४ है । आ० १८ में ५७ है ।
आ० १२ में चौथी पंक्ति है—“एक वचन कहि बालीअ देह ।”
आ० १७ मे पाचवीं पंक्ति है—“लाजनकरि कामणि कहै ।”
५. आ० १२ रहा । ६. आ० १२ बालियो ।
७ आ० १२ बालसो ।
८. आ० १२ चित्त ।
९. आ० १२ ( में नहीं है ) ।
१० आ० १२ तू जीना रहै ।
११. आ० १७ गोरी बेगा ।
१२. आ० ६ वली मुझसै आइ ।
यह छंद ६ में ६५ है । आ० १२ में ५८ है ।
आ० १२ में तीसरी पंक्ति है—“बोल्यो जी पाल्यो आपणौ” ।