बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
पृष्ठ 2, कुल 290 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका.
ब्रजभाषाके साहित्यमें कविवर विहारीलालकी सतसईभी
अपने ढंगका एक अनूठा ग्रंथ है, ऐसा कौन भाषाका रसि-
क है जिसको इस सतसईके दो चार दोहे स्मरण न हों, यह
ग्रन्थ जैसा सरस और मनोरम है वैसाही क्लिष्टभी है इसको
निर्मित हुए अभी पूरे २५० वर्ष भी नहीं हुए हैं, कि, इतनेही
समयमें इसपर बीस पचीस प्रसिद्ध टीके होचुके हैं।
सूरतमिश्र, कृष्णचंद्र, गोपाल, अनवरखां जुल्फिकारखाँ
यूसुफखां, करण, रघुनाथ, लालसरदार, गंगाधर, रामवक्स,
परमानन्द, जोखूरामकी कुण्डली, श्रीसाहित्याचार्यकी
कुण्डली, लल्लू लालादिके बनाये टीकोंसे सतसई अपूर्व
छवि धारण करचुकी है, परन्तु इन टीकोंमें पद्यरचना विशेष
और गद्यरचना न्यून होनेसे कठिनपर कठिनाई पड़नेसे वे
सर्वसाधारणके उपयोगी नहीं हुए हैं, और इसीकारण अति-
रसीली होनेसे भी सतसई घर घर नहीं विराजती है, सर्व-
साधारणकी बुद्धिमें कविवरका आशय प्रगट होजाय इसी
निमित्त सर्वसाधारणके उपयोगी भावार्थप्रकाशिकाटीका
निर्माणकर साथमें कठिन शब्दोंके अर्थ अलंकारादि लक्षण
पर और स्वनिर्मित दोहोंमें लिखकर पुनरुक्तिसे उसका
विस्तार नहीं किया है, और विभाव अनुभावादिका उल्लेख-
मात्र करके उसके समझनेके निमित्त 'साहित्य परिचय'
नामका एक पृथक् प्रबन्ध लिखा है, भावार्थ और अक्षरार्थ
बहुत सरलहो इसपर विशेष दृष्टि रक्खी है और कौनसा
दोहा कहाँ है इसकी खोज करनेमें परिश्रम न पडे इस
कारण सतसईके दोहोंकी अकारादिक्रमसे सूची भी लिखदी