भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 591, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें६०१
सूर्य : बुध : गुरु
(कुंडली में लग्न (१) भाव: सू. बु. गु.)
(१०) सूर्य, बुध और गुरु की युति हो तो जातक
शास्त्रज्ञ, शस्त्रज्ञ, लेखक, संग्राही, चतुर, अत्यन्त धनी तथा
नेत्र-रोगी होता है।
सूर्य : गुरु : शुक्र
(कुंडली में लग्न (१) भाव: सू. बु. शु.)
(११) सूर्य, बुध और शुक्र की युति हो तो जातक
माता, पिता तथा गुरुजनों से तिरस्कृत, स्त्री के कारण
दुःखी, आचार-विहीन, सबसे शत्रुता रखने वाला, दुर्बुद्धि
तथा परदेशवासी होता है।
सूर्य : बुध : शनि
(कुंडली में लग्न (१) भाव: सू. बु. श.)
(१२) सूर्य, बुध और शनि की युति हो तो जातक
दुराचारी, परम दुष्ट, नपुंसक-जैसे स्वभाव वाला, बन्धु-
बान्धवों से परित्यक्त, शत्रुद्वारा पराजित तथा नीच मनुष्यों
का संगी होता है।
सूर्य : गुरु : शुक्र
(कुंडली में लग्न (१) भाव: सू. गु. शु.)
(१३) सूर्य, गुरु और शुक्र की युति हो तो जातक
पण्डित, शूरवीर, परोपकारी, अल्पभाषी, धन-हीन, नेत्र-
रोगी, दुष्ट स्वभाव वाला, पराये कामों में अधिक रुचि
रखने वाला तथा राजा का आश्रित होता है।