सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 531, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 531

५४०
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कुम्भलग्न : द्वितीयभाव : राहु
दूसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक से धन तथा कुटुम्ब के सुख
में कमी आती है। कभी-कभी घोर आर्थिक संकटों
का शिकार भी बनना पड़ता है। बाद में वह अपनी
गुप्त युक्तियों तथा परिश्रम के बल पर धन-संचय
करता है तथा धनी एवं भाग्यवान समझा जाता
है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती होता है।
'कुंभ' लग्न की कुंडली में 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कुम्भलग्न : तृतीयभाव : राहु
तीसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम की अत्यधिक
वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से विरोध रहता है।
ऐसा व्यक्ति अपनी चतुराई तथा गुप्त युक्तियों
के बल पर सफलता एवं सुख के साधन प्राप्त करता
है और समाज में सम्मानपूर्ण स्थान बनाता है।
'कुंभ' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कुम्भलग्न : चतुर्थभाव : राहु
चौथे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक की माता-पक्ष से बहुत कष्ट
होता है। घरेलू जीवन अशान्तिपूर्ण रहता है। भूमि
तथा भवन के सुख में भी कमी आती है। परन्तु अनेक
संघर्षों से जूझने के बाद यह पर्याप्त सफलता भी प्राप्त
करता है।