सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 521, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 521

५३०
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कुम्भलग्न : अष्टमभाव : गुरु आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा
पुरातत्त्व का लाभ होता है। संचित धन की हानि तथा
कौटुम्बिक सुख में कमी का योग भी बनता है। पाँचवीं
नीच तथा शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव हूँको देखने से खर्च
अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से परेशानी
रहती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को
देखने से विशेष परिश्रम द्वारा धन की वृद्धि होती है तथा
कुटुम्ब का सुख मिलता है। नवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता के सुख
में कमी आती है तथा भूमि एवं भवन का भी सामान्य सुख ही मिलता है।
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कुम्भलग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'गुरु'
के प्रभाव से जातक के भाग्य की विशेष वृद्धि होती है
तथा धर्म का पालन भी होता है। कुटुम्ब तथा धन का
सुख भी पर्याप्त मिलता है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव
को देखने से शारीरिक प्रभाव की वृद्धि होती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से
भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम की वृद्धि होती है।
नवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या-बुद्धि एवं
सन्तान का श्रेष्ठ लाभ होता है।
'कुम्भ' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कुम्भ लग्न : दशमभाव : गुरु दसवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय
के क्षेत्र में यथेष्ट सफलताएँ मिलती हैं। वह ठाठ का
जीवन बिताता है तथा भाग्यशाली माना जाता है।
पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को देखने से धन
तथा कुटुम्ब की वृद्धि होती है। सातवीं शत्रुदृष्टि से
चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का यथेष्ट
सुख मिलता है। नवीं उच्चदृष्टि से षष्ठ भाव को देखने
से शत्रु-पक्ष पर अत्यन्त प्रभाव रहता है तथा झगड़े के
मामलों से लाभ होता है।