भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कुम्भलग्न : पंचमभाव : बुध
पाँचवें भाव में स्वराशि-स्थित 'बुध' के प्रभाव
से जातक को कुछ कठिनाइयों के साथ सन्तान-पक्ष से
सुख मिलता है तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में श्रेष्ठ लाभ
होता है। यह बुद्धिमान्, विवेकी तथा वाणी का धनी
होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादश भाव को देखने
से विवेक-बुद्धि द्वारा आमदनी के क्षेत्र में विशेष सफ-
लताएँ मिलती हैं।
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'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' [बुध] का फलादेश
कुम्भलग्न : षष्ठभाव : बुध
छठे भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित
बुध के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष से अशान्ति मिलती
है तथा विवेक-बुद्धि द्वारा झगड़े के मामलों में सफलता
प्राप्त हो पाती है। विद्या, सन्तान, आयु तथा पुरातत्त्व
के पक्ष की कमजोर पहलू हैं। परेशानियां भी उठानी
पड़ती हैं।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से
खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी सम्बन्धों से लाभ
होता है।
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'कुम्भ' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कुम्भलग्न : सप्तमभाव : बुध
सातवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक को कुछ कठिनाइयों के बाद
स्त्री तथा व्यवसाय-पक्ष में सफलता मिलती है। विद्या-
बुद्धि, आयु तथा पुरातत्त्व शक्ति का भी लाभ होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से कुछ
शारीरिक परेशानियां तो रहती हैं, परन्तु प्रभाव एवं
सम्मान की वृद्धि होती है।
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