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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 638 में से

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'मकर' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मकरलग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से न्यूनाधिक
लाभ होता है तथा विद्या-बुद्धि के पक्ष में भी कुछ कमी
रहती है । बुद्धि-बल से खर्च चलता है तथा बाहरी
सम्बन्धों से लाभ होता है। भाई-बहिनों से सामान्य
सुख मिलता है तथा पराक्रम की वृद्धि होती है।
पाँचवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से
भाग्य एवं धर्म की सामान्य वृद्धि होती है। सातवीं
मित्र-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी अच्छी रहती है। नवीं नीच-दृष्टि
से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कुछ कमी रहती है।
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मकरलग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'गुरु'
के प्रभाव से खर्चे की शक्ति से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव
स्थापित होता है। भाई-बहिनों से सामान्य विरोध रहता
है तथा पराक्रम में कमी आती है।
पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयाँ
रहती हैं।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वादश भाव को देखने
से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है।
नवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख की
वृद्धि के लिए अत्यधिक परिश्रम करने पर भी कष्ट ही मिलता है।
'मकर' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मकरलग्न : सप्तमभाव : बुध सातवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित उच्च के 'गुरु' के प्रभाव से जातक को सुन्दर
पत्नी मिलती है तथा स्त्री और व्यवसाय से सुख प्राप्त
होता है । बाहरी सम्बन्धों से लाभ मिलता है तथा
खर्च अधिक रहता है ।
पाँचवीं मित्र-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से
आमदनी अच्छी रहती है। सातवीं नीच तथा शत्रु-
दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य तथा
स्वास्थ्य में कमी आती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में तृतीय भाव को देखने से भाई-
बहिनों के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है।