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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 448, कुल 638 में से

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'धनु' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
धनुलग्न : पंचमभाव : राहु
पाँचवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष से कष्ट प्राप्त
होता है तथा विद्याध्ययन में भी बड़ी कठिनाइयां तथा
कमी रहती है। उसकी बोली में रूखापन रहता है। वह
धैर्य तथा गुप्त युक्तियों के बल पर काम तो चलाता है,
परन्तु चिन्ताओं से घिरा रहता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
धनुलग्न : षष्ठभाव : राहु
छठे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर अत्यन्त प्रभाव
रखता है तथा चातुर्य एवं गुप्त युक्तियों के बल पर उन्हें
परास्त करता रहता है।
ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, बहादुर तथा धैर्यवान्
होता है। वह मातृ-पक्ष को भी कुछ हानि पहुँचाता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
धनुलग्न : सप्तमभाव : राहु
सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
उच्च के राहु के प्रभाव से जातक की स्त्री-पक्ष की विशेष
शक्ति मिलती है। उसके एक से अधिक विवाह भी हो
सकते हैं। दैनिक आमदनी की वृद्धि के लिए वह अनेक
उपायों का आश्रय लेता है। वह धनी तथा सुखी जीवन
बिताता है।