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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 638 में से

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पृष्ठ 354

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'तुला' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
तुलालग्न : तृतीयभाव : शुक्र
तीसरे भाव में सामान्य शत्रु 'गुरु' की राशि
पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक का भाई-बहिनों से
कुछ वैमनस्य रहता है परन्तु पराक्रम में वृद्धि होती है।
आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म
तथा भाग्य की उन्नति होती है। ऐसा व्यक्ति प्रभाव-
शाली जीवन बिताता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थ भाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
तुलालग्न : चतुर्थभाव : शुक्र
चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'शुक्र' के प्रभाव से जातक को कुछ कमी के साथ माता,
भूमि तथा भवन का सुख प्राप्त होता है। आयु तथा
पुरातत्त्व का लाभ भी होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, सम्मान, लाभ
तथा सहयोग की प्राप्ति होती है।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
तुला लग्न : पंचमभाव : शुक्र
पाँचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'शुक्र' के प्रभाव से जातक को विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में
सफलता मिलती है, परन्तु सन्तान के पक्ष में कुछ कम-
जोरी रहती है। आयु तथा पुरातत्त्व का श्रेष्ठ लाभ
होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से
लाभ भी अच्छा रहता है। ऐसा जातक अपने बुद्धि-बल
से उन्नति करता है।