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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 638 में से

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'तुला' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
तुला लग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों के सुख तथा
पराक्रम में वृद्धि होती है। बाहरी स्थानों के संबंध
से लाभ होता है तथा भाग्योन्नति में सामान्य रुकावटें
आती हैं।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में नवमभाव को
देखने से भाग्य की वृद्धि होती है तथा धर्म का पालन
भी होता है। ऐसा व्यक्ति सुखी, धनी धर्मात्मा तथा
यशस्वी होता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
तुला लग्न : चतुर्थभाव : बुध
चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन
का सुख प्राप्त होता है। बाहरी संबंधों से यथेष्ट
लाभ होता है। वह खर्च भी खूब करता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, सहयोग,
प्रतिष्ठा, यश, मान तथा लाभ की प्राप्ति होती है।
'तुला' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
तुला लग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष से शक्ति
मिलती है तथा विद्या-बुद्धि का लाभ कुछ धनी के साथ
होता है। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भाग्य की वृद्धि
होती है। खर्च भी खूब रहता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से
आमदनी यथेष्ट रहती है। ऐसा व्यक्ति धर्म का पालन
करने वाला, प्रतिष्ठित तथा भाग्यशाली होता है।