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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 638 में से

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'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
सिंह लग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित
मंगल के प्रभाव से जातक को आयु एवं पुरातत्त्व की
शक्ति का लाभ होता है। परन्तु भाग्य तथा धर्म के
पक्ष में कमी रहती है। चौथी मित्र-दृष्टि से एकादश-
भाव को देखने से आमदनी खूब होती है। सातवीं
मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से कौटुम्बिक सुख
तथा धन का लाभ भी होता है।
आठवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से
पराक्रम बढ़ता है तथा भाई-बहिन के सुख में वृद्धि होती है। आठवीं सामान्य मित्र-
दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से जातक सुखी जीवन बिताता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
सिंहलग्न : नवमभाव : मंगल नवें भाव में स्वराशि-स्थित मंगल के प्रभाव से
जातक से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। चौथी
नीच दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च की
अधिकता से कष्ट प्राप्त होता है तथा बाहरी सम्बन्धों
से भी परेशानी होती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से
भाई-बहिन का सुख असन्तोषजनक रहता है, परन्तु
पराक्रम में वृद्धि होती है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि में
चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का यथेष्ट सुख प्राप्त होता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
सिंहलग्न : दशमभाव : मंगल दसवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित
मंगल के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यव-
साय के क्षेत्र में उन्नति, सफलता एवं सम्मान के
योग प्राप्त होते हैं। चौथी मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव
को देखने से शारीरिक प्रभाव तथा सौभाग्य में वृद्धि
होती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव को
देखने से माता, भूमि तथा मकान आदि का सुख
मिलता है। आठवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान एवं विद्या-वृद्धि के
क्षेत्र में भी सफलता प्राप्त होती है।