सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 147

१५५
'वृष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृष लग्न : षष्ठभावः शनि छठे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर उच्चस्थ
शनि के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में विशेष प्रभावी
रहता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी
सफलताएँ पाता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव
की देखने के कारण आयु एवं पुरातत्त्व के क्षेत्र में
चिन्ता-मुक्त लाभ होता है। सातवीं नीचदृष्टि से
द्वादशभाव को देखने के कारण बाहरी स्थानों से
असन्तोषजनक सम्बन्ध रहता है तथा खर्च की भी
परेशानी रहती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को
देखने के कारण पराक्रम की वृद्धि होती है, पर भाई-बहिनों से मेल-मिलाप नहीं रहता।
'वृष' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृष लग्न : सप्तमभावः शनि सातवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र
में सफलता एवं उन्नति प्राप्त होती है, परन्तु कुटुम्ब
के संचालन में कुछ कठिनाइयां बनी रहती हैं। पिता
तथा राज्य से भी शक्ति प्राप्त होती है। तीसरी दृष्टि
से नवमभाव की स्वराशि में देखने से भाग्यशक्ति बल-
वान होती है तथा धर्म में भी रुचि रहती है। सातवीं
मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य
तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थ
भाव को देखने से माता, भूमि व भवन के सुख में कुछ कमी का अनुभव होता है।
'वृष' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृष लग्न : अष्टमभावः शनि आठवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक की कुछ कठिनाइयों के साथ
दीर्घायु प्राप्त होती है। तीसरी दृष्टि से भाग्य, दशमभाव
की देखने से पिता, राज्य एवं सम्मान के पक्ष में कुछ
कमी रहती है। भाग्योन्नति के लिए बहुत कष्ट उठाना
पड़ता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने
के कारण प्रयत्नपूर्वक धन का संचय होता है। दसवीं
मित्र-दृष्टि से पंचमभाव की देखने से सन्तान तथा
विद्या के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। ऐसे जातक
की आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है।