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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 638 में से

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'वृष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृष लग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में चन्द्रमा की राशि पर स्थित बुध
के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है तथा
भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है। वह अपने
पराक्रम द्वारा धन उपार्जित करता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने के
कारण जातक की धर्म में रुचि बनी रहती है तथा
भाग्य में भी वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति पराक्रमी,
बुद्धिमान, विद्वान्, साहसी, धनी, धर्मात्मा एवं सज्जन
स्वभाव का होता है।
'वृष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृष लग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित
बुध के प्रभाव से जातक माता, भूमि, भवन तथा परि-
वार का यथेष्ट सुख प्राप्त करता है। ऐसा व्यक्ति
गंभीर, विवेकी, विद्वान तथा बुद्धिमान भी होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने के
कारण जातक की पिता तथा राज्य से भी यथेष्ट लाभ
होता है तथा व्यावसायिक क्षेत्र में भी सफलता मिलती है।
'वृष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
वृष लग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में स्वराशि स्थित उच्च के बुध
के प्रभाव से जातक बहु सन्ततिवाला, बुद्धिमान तथा
विद्वान् होता है तथा बुद्धिवल से धनोपार्जन भी खूब
करता है। कौटुम्बिक सुख उसे भरपूर मिलता है।
सातवीं नीचदृष्टि से एकादश भाव को देखने के
कारण आमदनी के क्षेत्र में कुछ कमी का अनुभव होता
है, परन्तु जातक अपनी मित्रा एवं सन्तान पक्ष की
सहायता से धन की वृद्धि करता है तथा सम्मान भी
पाता है।