भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः ८५
भोजः-तर्हि किमपि पठ ।
द्विजः--भोजं विना मत्पदसरणिं न कोऽपि जानाति ।
भोजः--ममाप्यमरवाणीपरिज्ञानमस्ति । राजा च मयि स्निह्यति । त्वद्-
गुणं च श्रावयिष्यामि । किमपि कलाकौशलं दर्शय ।
विप्रः-किं वर्णयामि ।
राजा--कलमानेतान्वर्णय ।
विप्रः-'कलमाः पाकविनम्रा मूलतलाघ्रातसुरभिकह्लाराः ।
पवनाकम्पितशिरसः प्रायः कुर्वन्ति परिमलश्लाघाम्' ॥ १७४ ॥
राजा तस्मै सर्वाभरणान्युत्तार्य ददौ ।
एक बार आखेट-रस में मग्न राजा भागते सूअर को देख कर स्वयम्
अकेला ( उसका पीछा करता ) दूर वन में जा पहुँचा । वहाँ एक श्रेष्ठ
ब्राह्मण को देख कर बोला--
द्विज, कहाँ जा रहे हो ?
द्विज--धारानगर ।
राजा-किसलिए ?
द्विज-धन पाने की इच्छा से भोज के दर्शनार्थ । वह पंडित को देता है
और मैं भी मूर्ख से याचना नहीं करता ।
भोज-ब्राह्मण, तो तुम विद्वान् हो अथवा कवि हो ।
द्विज-हे महाभाग, मैं कवि हूँ ।
भोज-तो कुछ पढ़ो ।
द्विज-भोज के अतिरिक्त मेरी कविता का अर्थ कोई नहीं समझ सकता ।
राजा-मुझे भी देववाणी का ज्ञान है और मुझसे राजा स्नेह करता है । मैं
तुम्हारे गुण उसे सुनाऊँगा । कुछ अपनी कला का कौशल दिखाओ ।
द्विज--क्या वर्णन करूँ ।
राजा-इन धानों का वर्णन करो ।
द्विज--पकजाने से झुके हुए धानों की जड़ में शुष्क कमल दल की सुगंध है ।
करते हैं श्लाघा परिमल की मंद पवन में झूम-झूम कर ।
राजा ने उसे सब आभूषण उतार कर दे दिये ।