भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
DevanagariHindipublished190 पृष्ठ
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'फल' के प्रति हास्यास्पद 'वामन की उद्बाहुता' है और उसका दुष्फल भोगने
को उसे तैयार रहना है, फिर भी—मगर फिर भी । भोगने दो 'मन्द' को
'कवि यशः प्रार्थी' बनने के लोभ का कुपरिणाम !
'भोज-प्रबंध' के अनेक हिन्दी-रूप हैं; ऐसी स्थिति में 'विद्योत्तिनी' का उद्योगी
इस उद्यम को अपना देवमंदिर की देहली पर एक वराटी चढ़ाने का अधिकार
मानता है । और यह अधिकार उसे मिलना ही चाहिए। कविवर मैथिलीशरण
के शब्दों में—
'जय देवमंदिर देहली,
समभाव से जिस पर चढ़ी
नृप हेम मुद्रा और रंकवराटिका।
२६-ग, हीरापुरी, गोरखपुर,
विश्वविद्यालय परिसरः —देवर्षि सनाढ्य
वि० सं० २०३५