भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'भोजप्रबन्धः २५'
राजा भी उस वाक्य से जैसे अमृत-प्रवाह में स्नान करता हुआ, जैसे
परब्रह्म में लीन नेत्रों से हर्ष के आँसू गिराने लगा और ब्राह्मण से बोला—
'ब्राह्मण श्रेष्ठ, सुनो—
निरंतर प्रिय बोलने वाले पुरुष संसार में सुलभ हैं; जो प्रिय न हो और
हितकारी हो, ऐसे वचन कहने वाला और सुनने वाला दुर्लभ है ।
जो समझदार हैं, वे हित चाहने वाले नहीं हैं, जो हित चाहने वाले हैं, वे
समझदार नहीं । जो मित्र भी हो, विद्वान् भी हो,—मनुष्यों में ऐसा व्यक्ति
मिलता वैसे ही दुर्लभ है, जैसे स्वादिष्ट और लाभकारी औषध मिलना ।
ऐसा कह विप्र को एक लाख देकर पूछा कि—'तुम्हारा नाम क्या है ?'
विप्रः स्वनाम भूमौ लिखति 'गोविन्दः' इति । राजा वाचयित्वा
'विप्र, प्रत्यहं राजभवनमागन्तव्यम् । न ते कश्चिन्निषेधः । विद्वांसः
कवयश्च कौतुकात्सभामानोतव्याः । कोऽपि विद्वान्न खलु दुःखभागस्तु,
एनमधिकारं पालय' इत्याह ।
ब्राह्मण ने अपना नाम धरती पर लिख दिया—'गोविंद' । वाँचकर राजा
बोला—'ब्राह्मण, तुम्हें प्रतिदिन राजभवन में आना है। तुम्हारे लिए कोई
रोक नहीं। और विद्वानों और कवियों को प्रसन्नतापूर्वक सभा में लाते रहना ।
कोई विद्वान् दुःखी न रहे । इस अधिकार का पालन करो ।'
एवं गच्छत्सु कतिपयदिनेषु राजा विद्वत्प्रियो दानवित्तेश्वर इति
प्रथामगात् । ततो राजानं दिदृक्षवः कवयो नानादिग्भ्यः समागताः।
एवं वित्तादिव्ययं कुर्वाणं राजानं प्रति कदाचिन्मुख्यामात्येनेत्थमभ्य-
धायि—'देव, राजानः कोशबला एव विजयिनः । नान्ये ।
स जयी वरमातङ्गा यस्य तस्यास्ति मेदिनी ।
कोशो यस्य स दुर्धर्षो दुर्गं यस्य स दुर्जयः ॥ ५६ ॥
देव लोकं पश्य—
प्रायो धनवतामेव धने तृष्णा गरीयसी ।
पश्य कोटिद्वयासक्तं लङ्घाय प्रवणं धनुः ॥ ६० ॥ इति
इस प्रकार कुछ दिवस व्यतीत होने पर राजा 'विद्वानों का प्यारा,'
'महान् दानशील' प्रसिद्ध हो गया । तब अनेक दिशाओं से राजा के दर्शनार्थी