भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतुम्हारे निमित्त जो नियम और उपवास मैंने किये, वे सब निष्फल हो
गये । दसों दिशामुख सूने हैं। पुत्र, सब जानने वाले, सर्वशक्तिमान् ईश्वर ने
सब संपत्ति नष्ट कर दी । बेटे' सहसा सिर कटे हुए इस दासियों के समूह को
देखो,'—ऐसा कह कर वह धरती पर गिर पड़ी ।
ततः प्रदीप्ते वैश्वानरे समुद्भूतधूमस्तोमेनेव मलीमसे नभसि पाप-
त्रासादिव पश्चिमपयोनिधौ मग्ने मार्तण्डमण्डले महामायाभवनमासाद्य
प्राह भोजं वत्सराजः—'कुमार, भृत्यानां दैवत, ज्योतिषशास्त्रविशारदेन
केनचिद् ब्राह्मणेन तव राज्यप्राप्तावुदीरितायां राज्ञा भवद्वधो व्या (१)
दिष्टः' इति ।
तत्पश्चात् आग जलने से उत्पन्न धुएँ की धुंध से आकाश के मलिन हो
जाने पर, पाप के डर से जैसे सूर्यमंडल के पश्चिम समुद्र में डूब जाने पर
महामाया के मंदिर में पहुँच कर वत्सराज भोज से बोला—'कुमार, सेवकों
के देवता, ज्योतिष विद्या में निपुण किसी ब्राह्मण के द्वारा आपकी राज्य-
प्राप्ति की घोषणा की जाने पर राजाने आपके वध की आज्ञा दी है।'
भोजः प्राह—
'रामे प्रव्रजनं बलेर्नियमनं पाण्डोः सुतानां वनं
वृष्णीनां निधनं नलस्य नृपते राज्यात्परिभ्रंशनम् ।
कारागारनिषेवणं च वरणं सञ्चिन्त्य लङ्केश्वरे
सर्वः कालवशेन नश्यति नरः को वा परित्रायते ॥ २८ ॥
भोज ने कहा—राम का देश से निर्वासन, वलि का बंधन, पांडुपुत्रों का
वनवास, यादवों की मृत्यु, राजा नल का राज्य से हट जाना, बंदीगृह में
निवास ( 'कारागार' के स्थान में 'पाकागार' भी प्राप्त होता है—अर्थ,
रसोइये का कार्य करना ) और पुनः स्वयंवर में दमयंती की प्राप्ति, ( 'वरणं'
के स्थान में 'मरणं' भी है—अर्थ मृत्यु अर्थात् लंका के राजा रावण की मृत्यु)
और लंकाधीश रावण की मृत्यु विचार कर निश्चय होता है कि प्रत्येक
मनुष्य काल के वश होकर नाश को प्राप्त होता है, कौन त्राण पाता है ?
( १ ) उक्त इत्यर्थः ।