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सर्वकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 190 में से

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पृष्ठ 177

दुःखी मनवाले श्री भोज ने निकट बैठे शोक के समुद्र में डूबे बुद्धिसागर से
किसी प्रकार भरे स्वर में कहा—'बुद्धिसागर, अब के वाद कोई चिकित्सक
हमारे राज्य में न रहे। वाहूट आदि के रचे सब ओषधि कोष ग्रन्थों को नदी
में बहा आओ। मेरा देवों से समागम का समय (मृत्युकाल) आ गया।'
यह सुनकर सभी नगरवासी, कवि और अंतःपुर के निवासी जन आँखों से
आँसुओं की धाराएँ बहाने लगे।

ततः कदाचिद्देवसभायां पुरन्दरः सकलमुनिवृन्दमध्यस्थं वीणामुनि-
माह—'मुने' इदानीं भूलोके का नाम वार्त्ता' इति। ततो नारदः प्राह—
'सुरनाथ, न किमप्याश्चर्यम्। किंतु धारानगरवासी श्रीभोजभूपालो
रोगपीडितो नितरामस्वस्थो वर्तते। स तस्य रोगः केनापि न निवारितः।
तदनेन भोजन्नृपालेन भिषग्वरा अपि स्वदेशान्निष्कासिताः। वैद्यशास्त्र-
मप्यनृतमिति निरस्तम्' इति।

तब फिर कभी देव सभा में सब मुनियों की मंडली के मध्य में स्थित
वीणाधारी मुनि नारद से इंद्र ने कहा—'हे मुनि, आजकल भूलोक का क्या
समाचार है?' तो नारद ने कहा—'देवराज, कोई विचित्र बात नहीं है,
किंतु धारा नगर का निवासी श्रीभोज राजा रोग से पीड़ित अत्यंत अस्वस्थ
है। उसका रोग किसी से दूर नहीं हो पाया। सो उन भोजनरपाल ने अच्छे-
अच्छे चिकित्सक भी अपने देश से निकाल दिये हैं। वैद्य शास्त्र भी झूठा है,
सो प्रसिद्ध कर दिया है।

एतदाकर्ण्य पुरुहूतः समीपस्थौ नासत्याविदमाह—'भोः स्वर्विद्यौ,
कथममृतं धन्वन्तरीयं शास्त्रम्।' तदा तावाहतुः - 'अमरेश देव, न
व्यलीकमिदं शास्त्रम्। किंन्वमरविदितेन रोगेण बाध्यतेऽसौ भोजः' इति।
इन्द्रः—'कोऽसाववार्यरोगः किं भवतोर्विदितः'। ततस्तावूचतुः—'देव'
कपालशोधनं कृतं भोजेन, तदा प्रविष्टः पाठीनः। तन्मूलोऽयं रोगः' इति।
तदेन्द्रः स्मयमानमुखः प्राह—'तदिदानीमेव युवाभ्यां गन्तव्यम्। न
चेदितःपरं भूलोके भिषक्शास्त्रस्यासिद्धिर्भवेत्। स खलु सरस्वतीविलासस्य
निकेतनं शास्त्राणामुद्धर्त्ता च' इति।