भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें१४२ भोजप्रबन्धः
पुनश्च प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ।
तदनंतर एक बार बल्लाल नरेश ने कालिदास से कहा - 'हे सुकवि, एक-
शिला नगरी का वर्णन करो। तो कवि ने कहा--
एक शिला नगरी में मृगनयनाओं के कूटाघात पूर्वक कटाक्ष करने से
गली-गली में तरुण बिना अपराध के ही पग-पग पर श्रृंखलित (जंजीर में
बँधे, आकृष्ट) हो जाते हैं।
राजा ने फिर से प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं।
पुनश्च पठति कविः--
'अम्भोजपत्रायतलोचनानामम्भोधिदीर्घास्विह दीर्घिकासु ।
समागतानां कुटिलैरपाङ्गैरनङ्गवाणैः प्रहता युवानः' ॥ २७८ ॥
पुनश्च बल्लालनृपः प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। एवं तत्रैव स्थितः कालिदासः।
कवि ने फिर पढ़ा---
समुद्र के सदृश बड़ी-बड़ी (एक शिला की) बावडियों में आयीं कमल-
पत्र के समान बड़ी-बड़ी आंखों वाली सुंदरियों के तिरछे कटाक्षों से तरुण-
जन काम बाणों से पीडित होते रहते हैं।
बल्लाल नरेश ने पुनः प्रत्येक अक्षर पर लाख मुद्राएँ दीं। इस प्रकार
कालिदास वहीं रहने लगा।
अत्रान्तरे धारानगर्यां भोजं प्राप्य द्वारपालः प्राह - 'देव, गुर्जरदेशा-
न्माघनामा पण्डितवर आगत्य नगराद्बहिरास्ते; तेन च स्वपत्नी राजद्वारि
प्रेषिता।' राजा - 'तां प्रवेशय' इत्याह। ततो माघपत्नी प्रवेशिता। सा
राजहस्ते पत्रं प्रायच्छत्।
इसी बीच धारा नगरी में भोज के पास पहुँच द्वारपाल ने कहा-
'महाराज, गुजरात देश से माघ नामक पंडितवर आकर नगर के बाहर
स्थित है और उन्होंने अपनी पत्नी को राजद्वार पर भेजा है।' राजा ने
कहा--'उन्हें प्रविष्ट कराओ।' तो माघ की पत्नी प्रविष्ट करायी गयीं।
उन्होंने राजा के हाथ में पत्र दिया।
राजा तदादाय वाचयति-
"कुमुदवनमपश्रि श्रीमदम्भोजषण्डं
त्यजति मुदमुलूकः प्रीतिमांश्चक्रवाकः ।