भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः १३७
एक वार राजा ने यान पर चढ़कर जाते हुए मार्ग में किसी तपस्वी को
देखकर उससे कहा--'आप जैसे तपस्वियों का दर्शन भाग्याधीन होता है ।
आपका ठांव कहाँ है और भोजन के निमित्त आप किनसे प्रार्थना करते हैं ?
ततः स राजवचनमाकर्ण्य तपोनिधिराह--
'फलं स्वेच्छालभ्यं प्रतिवनमखेदं क्षितिरुहां
पयः स्थाने स्थाने शिशिरमधुरं पुण्यसरिताम् ।
मृदुस्पर्शा शय्या सुललितलतापल्लवमयी
सहन्ते सन्तापं तदपि धनिनां द्वारि कृपणाः ॥ २७० ॥
राजन्, वयं कमपि नाभ्यर्थयामः, न गृह्णीमश्च' इति । राजा
तुष्टो नमति ।
राजा के वचन सुनकर उस तपोधन ने कहा--
'बिना कष्ट ही वृक्षों के फल वन-वन स्वेच्छा से मिल जाते;
शीतल, मधुर पुण्य नदियों का ठांव-ठांव जल हम पा जाते;
लता-पल्लवों की मृदु कोमल चिकनी शय्या पर सोते हैं,
कृपण व्यक्ति धनियों के द्वारे तो भी ताप-तप्त होते हैं ।
हे राजा, न हम किसी से प्रार्थना करते हैं, न लेते हैं।' तुष्ट हो
राजा ने प्रणाम किया ।
तत उत्तरदेशादागत्य कश्चिद्राजानं 'स्वस्ति' इत्याह । तं च राजा
पृच्छति--'विद्वन्, कुत्र ते स्थितिः' इति ।
तदनंतर उत्तर देश से एक विद्वान ने आकर राजा से 'स्वस्ति' कहा ।
राजा ने उससे पूछा--'हे विद्वान्, तुम्हारा स्थान कहाँ है ?'
विद्वानाह--
'यत्राम्बु निन्दत्यमृतमन्त्यजाश्च सुरेश्वरान् ।
चिन्तामणिं च पाषाणास्तत्र नो वसतिः प्रभो' । २७१ ॥
विद्वान् बोला--
जहाँ का जल अमृत से श्रेष्ठ, देवराजों-से अंत्यज दास;
दिव्य चिन्तामणिसे पाषाण, वहीं है देव, हमारा वास ।