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भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 190 में से

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पृष्ठ 10

२ भोजप्रबन्धः
लोभः प्रतिष्ठा पापस्य प्रसूतिर्लोभ एव च ।
द्वेषक्रोधादिजनको लोभः पापस्य कारणम् ॥ १ ॥
लोभ पाप का मूल है और लोभ ही पाप का जनक है। द्वेष, क्रोध आदि
को उत्पन्न करनेवाला लोभ पाप का कारण होता है ॥ १ ॥
लोभात् क्रोधः (१) प्रभवति क्रोधाद् द्रोहः प्रवर्तते ।
द्रोहेण नरकं याति शास्त्रज्ञोऽपि विचक्षणः ॥ २ ॥
लोभ से क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोध से द्रोह का प्रवर्तन होता है।
शास्त्रों का ज्ञाता विद्वान् भी द्रोह के कारण नरकगामी बनता है ॥ २ ॥
मातरं पितरं पुत्रं भ्रातरं वा सुहृत्तमम् ।
लोभाविष्टो नरो हन्ति स्वामिनं वा सहोदरम् ॥ ३ ॥
लोभ से आविष्ट मनुष्य माता-पिता, पुत्र, भाई, घनिष्ठ मित्र, स्वामी
और सगे भाई की भी हत्या कर डालता है ॥ ३ ॥
इति विचार्य राज्यं मुञ्जाय दत्त्वा तदुत्सङ्गे भोजमात्मजं मुमोच ।
ततः क्रमाद्राजनि दिवं गते सम्प्राप्तराज्यसम्पत्तिर्मुञ्जो मुख्यामात्यं
बुद्धिसागरनामानं व्यापारमुद्रया दूरीकृत्य तत्पदेऽन्यं नियोजयामास ।
ततो गुरुभ्यः क्षितिपालपुत्रं वाचयति ।
ऐसा विचार करके उसने राज्य मुंज को दे दिया और भोज को उसकी
छत्रच्छाया में छोड़ दिया । कुछ दिनों बाद (सिंधुल) राजा के दिवंगत होने
पर राज्य-संपदा प्राप्त करके मुंज ने बुद्धिसागर नामक मुख्य मंत्री को
मंत्रिपद से हटा दिया और उसके स्थान पर अन्य की नियुक्त कर दी।
राजकुमार (भोज) को गुरुजनों से शिक्षा दिलाने लगा ।
ततः क्रमेण सभायां ज्योतिः शास्त्रपारङ्गतः सकलविद्याचातुर्य-
वान् ब्राह्मणः समागम्य राज्ञे 'स्वस्ति' इत्युक्त्वोपविष्टः । स चाह--'देव,
लोकोऽयं मां सर्वज्ञं तत्किमपि पृच्छ ।
कण्ठस्था या भवेद्विद्या सा प्रकाश्या सदा बुधैः ।
या गुरौ पुस्तके विद्या तया मूढः प्रतार्यते' ॥ ४ ॥
इति राजानं प्राह ।
( १ ) वर्धत इति मावः ।