भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 96, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ें१७४ भावप्रकाशनिघण्टुः
चीनी कपूर की अपेक्षा अधिक उष्णता से जलता है। इसमें कपूर के अतिरिक्त कुछ अम्बर आदि
की मिश्रित गन्ध आती है। इसके छोटे, बड़े, गोल स्फटिक होते हैं जो सफेद, चमकीले, चिकने,
कुछ कड़े, चूर्ण करने में चीनी कपूर की अपेक्षा देर में चूर्ण होने वाले एवं वायु से आर्द्रता
को न सोखने वाले होते हैं। यह कपूर बहुत महंगा होता है। इसका रासायनिक संगठन
C10H18O1 है। इसके गुण एवं प्रयोग आदि सब चीनी कपूर के समान ही हैं लेकिन यह
त्वचा की रक्तवाहिनियों का अधिक विस्तार करता है तथा चीनी कपूर की अपेक्षा बाह्य प्रयोग
में कम दाहजनक है। यह मस्तिष्क के लिये अधिक अवसादक है तथा चीनी कपूर की अपेक्षा
अधिक मात्रा में दिया जा सकता है। इसके गुणधर्मों का वर्णन आगे चीनी कपूर के साथ ही
दिया गया है।
भीमसेनी कपूर के अभाव में निम्न विधि से बनाये हुये कपूर का व्यवहार किया जाता है।
दूब, शीतल मिरच इलायची और जो हरड़ इनको समान मात्रा में पीसकर एक बटलोई में बिछा
दें और उस पर कपूर के छोटे छोटे टुकड़े पानी में भिगो कर रख दें तथा कुछ घी भी डाल दें।
उस बटलोई पर केले का पत्ता ढांक कर उस पर एक दूसरा पीतल का कटोरा रख दें। इस कटोरे
में थोड़ा जल डाल दें। फिर बटलोई को जलयुक्त पात्र में रखकर मन्द आंच पर गरम करें। ऊपर
के कटोरे का पानी गरम होने पर उसे निकाल कर ठण्डा पानी डालते रहें। जब सब कपूर उड़कर
ऊपर जम जाय तब उसे निकालकर व्यवहार करें।
(२) चीनी या जापानी कपूर—यह तमाल जाति के वृक्षों से बनाया जाता है। इसका
विशेष वर्णन आगे किया गया है।
(३) पत्री या नाणी कपूर—वस्तुतः भारतीय कपूर यही है। यद्यपि इसके क्षुप भारतवर्ष
में बहुत होते हैं जिनसे बहुत कपूर निकाला जा सकता है तथापि अपने यहां इससे कपूर नहीं
निकाला जाता। भारत में जितना भी कपूर आवश्यक होता है वह विदेशों से ही आता है। पत्री
कपूर कुकरौंधा जाति के क्षुपों से प्राप्त होता है। इस क्षुप के कई भेद हैं जिनमें ये प्रधान हैं—
Blumea balsamifera, DC., B. lacera, DC., B. densiflora, B. DC., malcolmii
Hook. f. (ब्ल्यूमिया बालसमीफेरा, ब्यू. लैसेरा, ब्यू. डेन्सिफ्लोरा, ब्यू. मालकोल्माइ । यह
Compositae (काम्पोजिटी) वर्ग के क्षुप हैं। यह हिमालय में नेपाल से सिक्किम तक तथा
दक्षिणी पठार के पश्चिमी भाग में १७००-२५०० फीट तक पाये जाते हैं। ब्यू. डेन्सिफ्लोरा का
छोटा क्षुप आसाम, खासिया पहाड़, चटगांव एवं अन्य स्थानों में पाया जाता है। ब्यू. बाल-
समीफेरा के क्षुप बर्मा में इतने अधिक उत्पन्न होते हैं कि वह आधे संसार की कपूर की पूर्ति कर
सकता है। ब्ल्यूमिया के अतिरिक्त तुलसी की जाति में ऑसिमम् किलिमॅण्डसुचेरिकम् (Oci-
mum kilimandscharicum) तथा 'कर्पूर' (बं.) (Limnophila gratioloides R. Br.
लिम्नोफाइला ग्रैटियोलाइड्रीस्) आदि अन्य अनेक वनस्पतियों में कपूर की गन्ध आती है जिनसे
कपूर प्राप्त किया जा सकता है। पत्री कपूर का रासायनिक संगठन भीमसेनी कपूर से मिलता-
जुलता है।
(४) कृत्रिम कपूर—भारतवर्ष में यद्यपि ब्ल्यूमिया से काफी कपूर निकाला जा सकता है
तथापि अब रासायनिक विधि द्वारा कृत्रिम कपूर बनाया जाने लगा है जो वृक्षों से प्राप्त कपूर से
सस्ता होता है। औषध की अपेक्षा कपूर का अन्य सेल्यूलाइड आदि बनाने में बहुत उपयोग होता है।
नोट - राजनिघण्डु में रस, गुण, वीर्य के अनुसार कपूर के पोतास, भीमसेन, शीतकर,
शंकरावास, प्रांशु, पिंज, अब्दसार हिमधुता, बालुका, जूटिका, तुषार, हिम, शीतल एवं पक्विका
(पिचका) ये १४ भेद लिखे हुये हैं। फिर शिर, मध्य और तल, इन भेदों से तीन प्रकार का
कर्पूरादिवर्गः १७५
माना है। स्तम्भ के अग्रभाग में होने वाला कपूर शिरसंज्ञक, मध्य में—मध्यम और पत्तों के
तले होने वाला तलसंज्ञक है। प्रकाशवान्, स्वच्छ और फूला हुआ शिर; सामान्य फूला हुआ
और स्वच्छ मध्यम और तल में होने वाला चूर्णवत् कुछ पीला सा होता है। अन्य प्रकार से—
स्तम्भ के गर्भ में स्थित कपूर उत्तम; स्तम्भ के बाहर होने वाला मध्यम जो निर्मल, कुछ पीलापन
युक्त एवं चमकीला होता है; तथा कड़ा, सफेद, रूखा और फूला हुआ बाह्य कपूर कहलाता है।
आगे खाने योग्य कपूर के ये लक्षण दिये हैं—साफ, भंगरह्या के पत्तों के समान छोटे २ टुकड़ों
वाला, बहुत हलका, बिल्कुल सफेद, स्वाद में तिक्त रस वाला, शीतल, हृदय को प्रिय, घन,
आह्लादकारक सुगन्ध युक्त, स्नेहहीन, कड़े परतों से युक्त तथा चमकीला कपूर राजयोग्य होता
है और अन्य प्रकार के कपूर के खाने से व्रण एवं स्फोट आदि उत्पन्न होते हैं। इन्होंने 'चीनक'
नाम से एक अन्य कृत्रिम भेद भी माना है।
धन्वन्तरि निघण्डु में कपूर के भेद नहीं लिखे हुए हैं। कपूर का चरक में देशेमानि में उल्लेख
नहीं है लेकिन सू. अ. ५ में 'घ्राणोध्यास्तेष्वेव वैशद्यरुचिसौगन्ध्यमिच्छता।'•••••'तथा कर्पूर-
निर्यास'•••••••••' ऐसा उल्लेख है। सुश्रुत सू. अ. ४५ में तिक्त, सुगन्धि, शीतल, लघु, लेखन
आदि इसके गुण लिखे हैं एवं तृष्णा, मुखशोष तथा अरुचि आदि में उपयोगी लिखा है।
अष्टांगसंग्रह (वृद्धवाग्भट) में लिखा है—'रुचिवैशद्यसौगन्ध्यमिच्छन् वस्त्रेण धारयेत् । जातीलवंग
कर्पूर—'। चक्रदत्त, वृन्द आदि ने कास, श्वास, प्रमेह एवं ग्रहणी की चिकित्सा में कपूर
का उपयोग नहीं लिखा है लेकिन रसचिकित्सा वालों ने इसका प्रयोग उपर्युक्त रोगों में
किया है।
अथ चीनाककर्पूरः [ चिनिया ] । तस्य नामानि गुणांश्चाह
चीनाकसंज्ञः कर्पूरः कफघ्नस्करः स्मृतः । कुष्ठकण्डूवमिहरस्तथा तिक्तरसश्च सः ॥ ४ ॥
चीनिया कपूर के गुण—चीनिया कपूर को संस्कृत में चीनक कपूर कहते हैं। यह—कफ
को नष्ट करने वाला तथा कुष्ठ, खुजली और वमन को भी दूर करने वाला एवम् तिक्त रस से
युक्त होता है ॥ ४ ॥
२ चीनिया कपूर
हि०-चीनिया कपूर, चीनी कपूर, जापानी कपूर, फारमोसा कपूर । बं०-चीनेर कर्पूर ।
म०-चीनी कापूर । गु०-चिनाई कपूर । यू०-कैसूरी कपूर । ले०-Cinnamomum
camphora Nees & Eberm. (सिर्नमोमम् कॅम्फोरा नीज, एब. ) । Fam. Lauraceae
(लॉरेंसी) ।
इसके वृक्ष कोचीन चाइना से लेकर शंघाई तक तथा हैनाम से दक्षिणी जापान तक पाये जाते
हैं। भारत में देहरादून, कुल्लुकंगड़ा, मैसूर एवं नीलगिरी पर्वत आदि स्थानों में इसके वृक्षों को
लगाया गया है। दक्षिण की जलवायु इसके लिये अधिक उपयुक्त है लेकिन भारत में लगाये वृक्षों
में कपूर कम निकलता है।
इसका वृक्ष देखने में सुन्दर, ऊँचा तथा सदाहरित होता है। पत्ते-अण्डाकार, चिकने,
चमकीले, नोक की ओर संकुचित, २ से ४ इञ्च लम्बे, एकान्तर एवं पीताभ हरित होते हैं। छाल-
यह बाहर से खुरदरी और अन्दर से चिकनी होती है। फूल-छोटे-छोटे पीताभ श्वेत या रक्ताभ-