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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 143 में से

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पृष्ठ 91

१६४ भावप्रकाशनिघण्टुः

जब यव क्षुपों पर बाल निकलने वाले हों तब पञ्चांग को संग्रह कर सुखा दें। और सुखाने
पर आग लगा कर राख बना उसको २४ घंटे आठगुने पानी में भिगो दें । यदि पञ्चांग जलाने के
बाद उसकी राख काली रहे तो जल में डालने के पूर्व उसे कढ़ाई में डाल कर राख सफेद होने तक
पकाना चाहिए । फिर ऊपर का स्वच्छ जल निथार लें अथवा फिल्टर से पानी को छान लें ।
उस स्वच्छ जल को किसी कलईदार कड़ाही में अग्नि पर पकावें । पानी सूखने पर कड़ाही में जमे
हुए क्षार को खुरच कर सुरक्षित रखें । इसी को जवाखार कहते हैं। यवक्षार नाम से औषध में
उपर्युक्त विधि से तैयार किये हुए क्षार का व्यवहार करना चाहिये । इस क्षार में अधिकांश मात्रा
पोटैशियम् कार्बोनेट (Potassium carbonate) की रहती है तथा कुछ अन्य पदार्थ भी रहते
हैं। इसी प्रकार अधिकांश वृक्षों की राख में भी पोटैशियम् कार्बोनेट रहता है। तथा उनके अन्दर
रहने वाले अन्य विभिन्न पदार्थों के कारण विभिन्न क्षारों के गुणों में अन्तर पाया जाता है। काष्ठमय
झाड़ियों की अपेक्षा रसयुक्त वर्षांयु क्षुपों में यह अधिक पाया जाता है।
व्यापार की दृष्टिसे पोटैशियम् कार्बोनेट, आर्टिमिसिआ या वार्मवुड (Artemisia; Worm-
wood) नामक वृक्षों से, बीटरूट (Beet-root) से, भेड़ के बालों को धो कर उस घोल से,
सोराखार से एवं पोटैशियम् सल्फेट (Potassium sulphate) आदि से प्राप्त किया जाता है ।
भूमि में पोटैशियम् के लवण रहते हैं। वृक्ष भूमि से इनका शोषण कर लेते हैं। इनके बिना वृक्षों
की वृद्धि नहीं होती।
उपर्युक्त क्षार मृदुक्षार कहलाता है। तीक्ष्ण क्षार बनाने के लिये क्षारोदक (वृक्ष को जला कर
बनाई राख के जलीय भाग) में चूना मिलाना चाहिये तथा बाद में उस घोल को सुखाना चाहिये ।
यह अत्यन्त दाहक होता है तथा इसमें पोटैशियम् हाइड्रोक्साइड रहता है । यवक्षार का स्वाद
राखी के समान किन्तु कुछ नमकीन होता है।
गुण और प्रयोग—यवक्षार अग्निदीपक, मृदुविरेचक, अम्लतानाशक, रक्तशोधक, सौम्य
मूत्रल, कफनिःसारक एवं कुछ स्वेदजनक है ।
इसका उपयोग शूल, अजीर्ण, अम्लपित्त, अम्लोत्कर्ष, मूत्रकृच्छ्र, यकृत् प्लीहा एवं अन्य ग्रन्थियों
की वृद्धि, ज्वर, अर्श, कामला एवं गुल्म में किया जाता है।
(१) जीर्ण आमाशयशोथ तथा आमाशय में श्लेष्मा की अधिकता होने पर भोजन के
२० मिनट पूर्व यवक्षार का उपयोग अन्य सुगन्धि एवं तिक्त औषधों के साथ किया जाता है जिससे
श्लेष्मा कम हो कर पाचक स्रावों की उत्पत्ति होती है तथा पाचन ठीक होता है। परिणाम शूल
एवं अम्लपित्त आदि विकारों में भोजन के २ घंटे पश्चात् इसके उपयोग से अम्लता की अधिकता से
होने वाला शूल नहीं होता। नींबू के रस के साथ फेनायमान मिश्रण के रूप में लेने से आमाशय
पर शामक प्रभाव होकर वमन में लाभ होता है।
(२) यकृत्, प्लीहावृद्धि एवं गुल्म आदि में बड़ाहर्रा, रोहितक की छाल एवं छोटी पीपल के
क्वाथ के साथ इसका उपयोग किया जाता है। इसके उपयोग से आन्त्रिक श्लेष्मा कम होकर पित्त
मार्ग का अवरोध दूर होने से कामला में लाभ होता है ।
(३) इसके उपयोग से कफ पतला होकर निकलने लगता है। शुष्क कास तथा श्वसनिका-
शोथ आदि में ४ रत्ती यवक्षार, १० बूंद अडूसा का रस तथा २ रत्ती लौंग का चूर्ण देने से
लाभ होता है।
(४) ज्वर तथा अन्य अम्लोत्कर्ष की अवस्थाओं में इसका उपयोग किया जाता है । ज्वर में
स्वेदल रूप में पसीना लाने के लिये नीम के रस या क्वाथ के साथ इसका उपयोग लाभदायक है ।


हरीतक्यादिवर्गः १६५
(५) इससे वृक्कों को उत्तेजना मिलने से मूत्रोत्सर्ग अधिक होता है। मूत्रकृच्छ्रता में इससे
प्रक्षोभ का शमन होकर पेशाब की जलन दूर होती है। मूत्र की प्रतिक्रिया क्षारीय होने से यूरिक्
एसिड (Uric acid) का उत्सर्ग अधिक हो कर आमवात, वातरक्त तथा यूरिक् एसिड से बनने
वाली पथरी में लाभ होता है।
(६) इसके घोलका बाह्य प्रयोग शीतपित्त, उददं, खुजली, श्वित्र, विचर्चिका एवं कीटदंश
पर किया जाता है। इससे त्वचा के ऊपर का तैलीय अंश घुल कर निकल जाता है जिससे सादे
जल की अपेक्षा इसके घोल से त्वचा अधिक साफ हो जाती है ।
अधिक मात्रा में इसके प्रयोग से अतिसार, शोथ, फॉस्फेट्स से बनने वाली पथरी आदि
व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं तथा वृक्क भी विकार ग्रस्त हो जाते हैं ।
मात्रा—१-२ रत्ती ।
९४ सज्जी !
हि०-सज्जो, सज्जीखार, सज्जीमिट्टी । बं०-साजिखार, साजीमाटी, साजी खार । म०-सज्जी-
खार, साजी । मा०-साजीखार । गु०-साजीखार । क०-साजीखारं, साजी खार, सज्जीखार ।
ता०-सज्जीकारं । पं०-सज्जी, लोटा सज्जी, खगनखार । फा०-संजारे कखिया, अशखार । अ०-
कलिमास्कर, कलिवशम्बूअ असफर । अं०-Barilla (बर्रिला-खारे वृक्ष की राख); Impure Car-
bonate of Soda (इम्प्योअर कार्बोनेट ऑफ सोडा ) ।
सज्जी—सफेदी लिए भूरे रंग का एक प्रसिद्ध खार है। औषध के अतिरिक्त कांच, साबुन एवं
कागज आदि अनेक पदार्थों के निर्माण में इसका उपयोग किया जाता है। सज्जी कई प्रकार
से बनाई जाती है जिनका संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है।
(१) समुद्र के किनारे तथा क्षारीय भूमि में उत्पन्न होने वाले कुछ वृक्ष होते हैं, उनकी
राख में सज्जी होती है। समुद्र के सेवार में भी सज्जी होती है जिसकी राख को केल्प (Kelp)
कहा जाता है। ये स्पंज के समान कड़े गट्ठे होते हैं तथा इसमें ३-८% सज्जी होती है। खारे
वृक्षों की राख को खार सज्जी (Barilla-बॅरिला) कहा जाता है जिनमें २५-४०% सज्जी होती
है। भारतवर्ष में निम्न तीन वर्ग के खारे वृक्ष पाये जाते हैं—चिनोपोडिएसी (Chenopodia-
ceae), सैलिकोर्निएसी (Salicorniceae) एवं संल्सोलेसी (Salsolaceae) । पंजाब में
अक्तूबर से जनवरी तक सज्जी बनाने के कारखाने काम करते हैं । खारे वृक्षों को सुखाकर
६ फीट गोल एवं ३ फीट गहरे गढ़े में डालकर धीरे-धीरे जलाते हैं । गढ़े में हांडियों को नीचे
छेद कर उल्टे मुंह रखते हैं । कुछ समय बाद राख में से पतला द्रव निकल कर हांडियों में
जमता है । ४ दिन वैसे ही अपने आप ठंडा होने देते हैं । हांडियों में जो सज्जी जमा होती है
उसे वहां लोटासज्जी कहा जाता है । हांडियों के बाहर जो सज्जी जमती है वह अशुद्ध होती है ।
लोटासज्जी कॅरोक्साइलॉन् ग्रिफिथिआइ (Caroxylon Griffithii) नामक वृक्ष से बनाई
जाती है। यह सबसे शुद्ध होती है तथा औषध में इसका व्यवहार किया जाता है। मांटगोमरी
प्रांत में इसे खगनखार कहा जाता है। दूसरे वृक्षों से प्राप्त संज्जी जो हलके दर्जे की होती है उसे
भूसीसज्जी कहते हैं। लोटासज्जी को औषध में व्यवहार में लाने के पूर्व शोधन कर लेना चाहिये ।
इसके लिये इसे दुगुने जल में बंद पात्र में २ घंटे उबालते हैं तथा बार-बार हिलाते जाते हैं ।
फिर ऊपर के गरम तरल भाग को छान कर तामचिनी की कड़ाइयों में मन्द आंच पर सुखाते हैं ।
बचे हुवे नीचे के भाग में फिर जल डालकर उबाल कर ऊपर का द्रव छान कर सुखाते हैं । इस