भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 42, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ ६४
६४ भावप्रकाशनिघण्टुः
गुण और प्रयोग—मुलेठी मधुर, शीतल, स्नेहन, बल्य, वृष्य, रसायन, कफशामक, स्वर्य,
नेत्र्य, मूत्रजनन, स्तन्यवर्धक, शोथहर एवं व्रणरोपक गुणों से युक्त होती है ।
(१) इसमें स्नेहन तथा सौम्य कफ निःसारक गुण होने के कारण इसका मुख्य उपयोग स्वर-
भंग, कास, श्वसनिका शोथ एवं गलशोथ आदि में किया जाता है। इसके लिये इसके टुकड़े को मुख में
रख कर चूसने को दिया जाता है तथा तीसी के साथ इसके क्वाथ का उपयोग किया जाता है।
(२) मीठी होने के कारण काथों को मधुर बनाने के लिये तथा अनेक औषधियां जैसे
सनाय, एलुवा आदि को सुस्वादु बनाने के लिये तथा खांसी के लिये चूसने की गोलियों में इसका
उपयोग करते हैं। इसके चूर्ण का उपयोग गोली बनाने में सहायक द्रव्य के रूप में व्यवहार
में आता है ।
(३) मूत्र मार्ग के प्रक्षोभ में यह बहुत उपयोगी है। इससे पेशाब की जलन दूर होती है।
(४) अम्लपित्त में इसके उपयोग से आमाशयिक अम्ल कम होकर शूल दूर होता है।
(५) चीन में इसका व्यवहार रसायन औषधि की दृष्टि से बहुत किया जाता रहा तथा
अपने यहां भी इसे रसायन, बल्य तथा शुक्रल मानते हैं।
(६) इसका सत्व रुब्बेसूस, जो काले रंग का तथा मीठा होता है, का व्यवहार खांसी एवं
गले की तकलीफ आदि में चूसने के लिए किया जाता है ।
(७) सुश्रुत में 'सर्वापघातशमनीय' योग में इसका अन्तर्भाव किया गया है। इस प्रकार
सभी प्रकार के अभिघातों से उत्पन्न लक्षणों में इसका प्रयोग उत्तम माना गया है।
(८) इसका उपयोग क्षतक्षीण, रक्तवमन, हृद्रोग एवं अपस्मार आदि में भी किया जाता
है। दूध अथवा घृत और मधु के साथ इसको देना चाहिये ।
(९) घृत के साथ इसके कल्क का प्रयोग घावों पर लगाने के लिये उपयोगी है। भिलावे
से यदि त्वक्शोथ हो गया हो तो मुलेठी और तिल को दूध में पीस कर लेप करने से लाभ
होता है।
मात्रा—चूर्ण—१-४ माशा ।
अथ काम्पिल्लस्य नामगुणानाह
काम्पिल्लः कर्कशश्चन्द्रो रक्ताङ्गो रोचनोऽपि च ॥
काम्पिल्लः कफपित्तास्रकृमिगुल्मोदरव्रणान् । हन्ति रेची कटूष्णश्च मेहानाहविषाश्मनुत् ॥
कबीला के नाम तथा गुण—काम्पिल्ल, कर्कश, चन्द्र, रक्ताङ्ग और रोचन ये नाम कबीला के
हैं। कबीला-कफ, रक्तपित्त, कृमि, गुल्म, उदररोग एवं व्रण (घाव) को दूर करता है। तथा यह
रेचक (दस्तावर), कटु रस युक्त और उष्णवीर्य है। एवं प्रमेह, आनाह, विष तथा पथरी को नष्ट
करने वाला होता है ।। १४७ ॥
४४ काम्पिल्ल ( कबीला )
हि०—कबीला, कमीला, काम्बीला । ब०—कमिला, कमलागुरी । म०—शेन्द्रि कपिला ।
गु०—कपीलो । क०—चसारे, चन्द्रहिदृदु । पं०—कमल । ते०—कुम्कुर । ता०—कपिला रंग,
कपिला पोडि । मला०—पोनागम । फा०—कम्बिलाय, कमीलह, कम्बिला । अ०—कम्बील,
किम्बील, वार्सा । आं०—Kamala (कमल) । ले०—Mallotus philippinensis, Muell-
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हरीतक्यादिवर्गः ६७
Arg. (मॅलोटस् फिलिपाइनेन्सिस, म्यूएल-आर्ग.) । Fam. Euphorbiaceae (यूफोर्बियेसी) ।
यह प्रायः सब गरम प्रान्तों में हिमालय पहाड़ के नीचे से पूरव की ओर सिन्ध से दक्षिण,
बंगाल, ब्रह्मा, सिंगापूर, सिलोन एवं मलाया द्वीप समूह आदि प्रान्तों में पाया जाता है।
इसका सदा हरित वृक्ष-मध्यमाकार का २५-३० फीट तक ऊंचा होता है। छाल—चौथाई इंच
मोटी, खाकी रंग की फटी सी और भीतर से लाल दिखाई पड़ती है। पत्ते—गूलर के पत्तों के
समान ३ से ९ इंच तक लम्बे, अंडाकार, नोकदार, विषमवर्ती और निम्न पृष्ठ रोमश रक्ताभ होते
हैं। कार्तिक से पूस तक फूल फल आते हैं और उष्णकाल में फल पकते हैं। फूल—छोटे छोटे भूरा-
पन युक्त लाल रंग के आते हैं। फल—त्रिदल आकार में झरबेर के समान और पकने पर लाल
रवेदार रज से ढका रहता है। इसी लाल रज को कबीला कहते हैं। बीज—चिकने, गोल और
काले होते हैं।
'कबीला वायविडङ्ग की रज का नाम है' यह कहना भ्रमात्मक है। कबीला के बीजों को
कहीं कहीं वायविडङ्ग की जगह व्यवहार में लाते हैं जो अनुचित है। वास्तव में वायविडङ्ग और
कबीले के वृक्ष एक नहीं, दो भिन्न-भिन्न हैं।
इस वृक्ष के फलों के ऊपर के पराग (ग्रन्थि तथा रोम) को कबीला कहते हैं। फल पक जाने
पर उनको कपड़े में डालकर अथवा हाथ से रगड़ कर इसे अलग करते हैं। इस लाल बादामी रंग की
बुकनी में न तो स्वाद होता है न गन्ध । इसमें से जो रोम, ग्रन्थि युक्त होते हैं उनका डण्ठलं
एक कोशा का (प्रायः नहीं रहता) तथा ऊपर का भाग गोल ४०-१०० म्यू व्यास का एवं
२०-५० अण्डाकार या व्यस्तलठ्वाकार कोषाओं से युक्त होता है। ये कोषाएं एक आधारीय
कोशा के ऊपर चक्राकाररूप में एक रालीय निर्यास में डूबी हुई रहती हैं। बिना ग्रन्थि के रोम
बहुत कम होते हैं जिनके अन्तिम भाग नुकीले तथा मुड़े हुये होते हैं। इनके अतिरिक्त इसमें फलके
छिलके एवं बालू के कण आदि पदार्थ मिले रहते हैं।
परीक्षा—इसमें यदि निशास्ता या कुसुम्भ की मिलावट हो तो अणुवीक्षण यन्त्र से पहचान
सकते हैं। लाल मिट्टी, बालू वा मण्डूर की मिलावट हो तो इसे जल में डालने पर मिट्टी आदि
नीचे बैठ जाती है। ऊपर जो बुकनी तैरती है उसे सुखाकर काम में लाना चाहिये। जल से भींगी
हुई उंगली से शुद्ध कबीले को उठाकर सफेद कागज पर जोर से लकीर खींचने या रगड़ने से
पीले रंग का निशान होता है। शुद्ध कबीले में राख ९% से अधिक नहीं होनी चाहिये तथा अम्ल
में न घुलनेवाली राख ६% से अधिक नहीं होनी चाहिये। ईथर में घुलने वाले सत्व जो उड़न-
शील नहीं होते, उनकी शुष्क अवस्था में मात्रा ६६% से कम न होनी चाहिये। यह शीत जल में
अघुलनशील, उष्णजल में अल्प घुलनशील एवं क्षार, मद्यसार और ईथर में घुलनशील होता है,
जिससे लाल रंग का घोल बनता है।
रासायनिक संगठन—इसमें रोटलेरिन् (Rottlerin, C31 H30 O8) नामक एक रवेदार
पदार्थ से युक्त एक बदामी लाल रंग की राल होती है। यह ईथर में घुलनशील तथा जल में अघुलन
शील होती है। इसके अतिरिक्त इसो-रोटलेरिन् (iso-Rottlerin) नामक पदार्थ रहता है जो
शायद रोटलेरिन् का अशुद्ध स्वरूप है। इनके अतिरिक्त इसमें पीले रवेदार पदार्थ, पीली और
लाल राल एवं मोम आदि रहते हैं। अल्प मात्रा में उड़नशील तैल, स्टार्च, शर्करा, टैनिन् एवं
ऑक्सेलिक तथा साइट्रिक एसिड भी पाये जाते हैं।
गुण और प्रयोग—कबीला कृमिघ्न, विरेचक, त्वग्दोषहर एवं व्रण रोपक है। स्फीत कृमि के
लिये यह अच्छी औषधि है। अधिक मात्रा से हल्लास तथा बेहोशी आती है। चेष्टावह नाडी तथा