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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 143 में से

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पृष्ठ 107

१६६ भावप्रकाशनिघण्टुः
( ३ ) चक्कर आना, अंगघात तथा अन्य वातविकारों में इसको खिलाते हैं एवं बाह्य लेप भी
करते हैं ।
( ४ ) हिचकी में मधु के साथ इसके चूर्ण को खिलाया जाता है ।
( ५ ) अग्निमान्द्य, अरुचि, वमन, अतिसार तथा आंव आदि में इसका चूर्ण खिलाया
जाता है ।
( ६ ) अगर एवं ईश्वरमूल को पीस कर शिरःशूल में एवं बच्चों की खांसी में छाती पर उसका
लेप किया जाता है। इससे खुजली एवं दाह कम होने के कारण रक्त त्वचा ( Erythema ),
त्वक् शोथ, विचर्चिका, गजचर्म एवं फोड़े आदि में इसको जल में घिस कर लगाते हैं । वातिक
पीडा में भी इससे लाभ होता है। इससे जूं आदि में भी लाभ होता है।
( ७ ) अगर का इत्र-१-२ बूंद श्वेत पान पर लगा कर खिलाने से तमकश्वास में आराम
मिलता है। वाजीकरण के लिये इसके पुराने इत्र को पान के साथ खिलाते हैं ।
मात्रा - चूर्ण ५-१५ र०; इत्र १-२ बूंद !

अथ देवदारु । तस्य नामानि गुणांश्चाह
देवदारु स्मृतं दारुभद्रं दार्विन्द्रदारु च । मस्तदारु द्रुकिलिमं किलिमं सुरभूरुहः ॥ २४ ॥
देवदारु लघु स्निग्धं तिक्तोष्णं कटुपाकि च । विबन्धाध्मानशोथामतन्द्राहिक्काज्वरास्रजित् ।
प्रमेहपीनसरुजेष्मकण्डूसमीरनुत् ॥ २५ ॥
देवदारु के नाम तथा गुण-देवदारु, दारुमद्र, दारु, इन्द्रदारु, मस्तदारु, द्रुकिलिम, किलिम
और सुरभूरुह ये सब देवदारु के संस्कृत नाम हैं। देवदारु-लघु, स्निग्ध, तिक्त रसयुक्त,
उष्णवीर्य, विपाक में कटुरसयुक्त, एवम् विबन्ध, आध्मान, शोथ, आम, तन्द्रा, हिचकी, ज्वर,
रक्तदोष, प्रमेह, पीनस, कफ, खांसी, खुजली तथा वायु को नष्ट करने वाला होता है ॥ २४-२५ ॥

११ देवदारु
हि०, म०, गु०-देवदार । बं०-देवदारु । पहाड़ी-केलोन । ते०-देवदारि चेट्टु । पं०-केल्लु ।
ता०-देवदारु चेडि । फा०-देवदार । अं०-Himalayan cedar ( हिमालय सिडार ); Pinus
deodar ( पाइनस् देवदार । ले०-Cedrus deodara ( Roxb. ) Loud. ( सेड्रस् देवदार )।
Fam. Pinaceae (पिनेसी) ।
पश्चिमोत्तर हिमालय में कुमाऊँ से पूर्व की ओर यह पाया जाता है। जौनसार और गढवाल
में ७ से ८॥ हजार फीट के बीच का भाग देवदारु वृक्षमाला का प्रधान उत्पत्ति स्थान है। इसका
वृक्ष-बहुत विशाल, चिरायु, सुन्दर, १६० से १८० फीट तक ऊँचा तथा कहीं कहीं इससे
अधिक ऊँचा होता है। शाखाएं-दिगन्तसम फैली हुई परन्तु शाखाम कुछ नीचे की ओर झुके
हुये रहते हैं । पत्ते-त्रिकोण युक्त, सूच्याकार, १-१॥ इञ्च लम्बे, लम्बी टहनियों पर एकाकी और
पेचदार क्रम से निकले हुये और छोटी टहनियों पर गुच्छों में निकले हुये रहते हैं। फल-
शाखाग्रों पर, एकाकी, ४-५ इञ्च लम्बे और ३-४ इञ्च मोटे होते हैं । बीज-३/८ इञ्च तक लम्बे,
त्रिकोणाकार या अर्धचन्द्राकार और पक्ष युक्त होते हैं। बीजपत्र लगभग १० होते हैं

कर्पूरादिवर्गः १६७
देवदार की सुगन्ध युक्त लकड़ी (काष्ठसार ) पीताभ बादामी रंग की तथा तैल से भरी होती
है । लकड़ी को जलाकर एक तैल निकालते हैं जिसे केलोन का तेल कहा जाता है। यह तैल
बहुत पतला होता है।
औषध में काष्ठसार, तैल, पत्र एवं कोमल शाखाओं का व्यवहार किया जाता है। दक्षिण तथा
गुजरात की तरफ देवदार नाम से सरल ( चीड़ की ) की लकड़ी बिकती है।
नोट-चरक एवं सुश्रुत में इसका अनेक रोगों में उपयोग किया गया है।
रासायनिक संगठन- इसमें केलोन का तैल नामक एक तैल पाया जाता है।
गुण और प्रयोग - देवदार स्वेदजनन, मूत्रजनन, वातानुलोमक, वात-कफहर एवं त्वग्दोषहर
है। इसका तैल टर्पेण्टाइन के समान गुण वाला होता है लेकिन उससे यह कुछ न्यून गुण
वाला है।
देवदार का प्रयोग ज्वर, जीर्ण आमवात, शिरःशूल, श्लीपद, जलोदर, कास, श्वास, अतिसार,
वातिक विकार, शोथ, अश्मरी तथा व्रण में किया जाता है। इसके तैल का प्रयोग कुष्ठ, कफ, कास
एवं त्वचा के रोगों में किया जाता है।
( १ ) ज्वर में इसको देने से काफी पसीना निकलता है तथा मूत्र की मात्रा भी बढ़ती है।
ज्वर चाहे शोथ से हो या कफजन्य हो इसके प्रयोग से शोथ कम होता है तथा कफ की दुर्गन्ध
दूर होकर कफ कम होता है।
( २ ) जलोदर में देवदार, मङ्गेजन की छाल तथा अपामार्ग प्रत्येक ३ तो० गोमूत्र में पीसकर
देने से मूत्र द्वारा जल निकल जाता है तथा रोगी को स्फूर्ति मालूम पड़ती है।
( ३ ) सोजाक, फिरंग, वातरक्त एवं आमवात में देवदार्व्यादि काथ का रसायन के रूप में
प्रयोग करते हैं।
( ४ ) श्लीपद में इसको सरसों के तैल के साथ खिलाते हैं तथा चित्रक के साथ गोमूत्र में
पीस कर लगाते हैं ।
( ५ ) वातिक हृद्रोग में देवदार एवं सोंठ को पीसकर पिलाने से हृदय की धड़कन तथा शूल
आदि दूर होते हैं।
( ६ ) हिक्का तथा श्वास में इसका क्वाथ पीने से लाभ होता है।
( ७ ) शिरःशूल में इसे जल में घिस कर कपाल पर लगाते हैं। पुराने शोथ पर हल्दी एवं
गुग्गुलु के साथ इसका लेप किया जाता है ।
( ८ ) इसका तैल-कुष्ठ में बहुत लाभदायक माना जाता है। इसको अधिक मात्रा में देना
पड़ता है। जीर्ण त्वचा के रोगों में इसको खिलाते हैं तथा बाह्य लगाते भी हैं। इससे पुराने तथा
दुर्गन्ध युक्त व्रण अच्छे हो जाते हैं। कर्णशूल में इसका तैल डालने से आराम मिलता है। कफज
कास में त्रिकटु एवं यवक्षार के साथ इसका प्रयोग किया जाता है।
मात्रा--चूर्ण ३-६ माशा; तैल १०-४० बूंद !

अथ सरलः ( धूप ) । तस्य नामानि गुणांश्चाह
सरलः पीतवृक्षः स्यात्तथा सुरभिदारुकः । सरलो मधुरस्तिक्तो कटुपाकरसो लघुः ॥ २६ ॥
स्निग्धोष्णः कर्णकण्ठाक्षिशिरोगदहरः स्मृतः । कफानिलस्वेददाहकासमुच्छाव्रणापहः ॥ २७ ॥