भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ
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- ९१६ भावप्रकाशनिघण्टुः
गालित (वस्त्र से छाने हुये) दही-अति स्निग्ध, वातनाशक, कफकारक, गुरु, बल तथा पुष्टि को करने वाला,
रुचिकारक, मधुररसयुक्त तथा अत्यन्त पित्तकारक नहीं होता है अर्थात् किञ्चित्त पित्त करने वाला होता है। [१५]
अथ शर्कराऽदिसहितस्य दध्नो गुणानाह
सशर्करं दधि श्रेष्ठं तृष्णापित्तास्रदाहजित्। सगुडं वातनुद् वृष्यं बृंहणं तर्पणं गुरु ।।१६।।
शक्कर मिला हुआ दही-श्रेष्ठ होता है एवम् तृष्णा (प्यास), पित्त, रक्तविकार तथा दाह को नष्ट करने वाला
होता है।
गुड़ मिला हुआ दही-वातनाशक, वीर्यवर्धक, बृंहण (रस रक्तादिवर्धक), तृप्तिकारक तथा गुरु होता है। [१६]
अथ रात्रौ दधिभक्षणस्य निषेधमाह
न नक्तं दधि भुञ्जीत न चाप्यघृतशर्करम्। नामुद्गसूपं नाक्षौद्रं नोष्णं नामलकैर्विना ।।१७।।
रात्रि में दही खाने का निषेध-रात्रि में दही नहीं खाना चाहिये और बिना घी तथा शक्कर के या बिना मूँग की
दाल के वा बिना मधु के गरम किंवा बिना आँवला के दही नहीं खाना चाहिये। [१७]
❖ अयमर्थः
रात्रौ दधि न भुञ्जीत, चेत्तदा-अघृतशर्करममुद्गसूपमक्षौद्रमुष्णं विनाऽऽमलकञ्च दधि न भुञ्जीत। तेन
घृतशर्कराऽऽदियुक्तं दधि रात्रावपि भुञ्जीतेत्यर्थः ।
यहाँ पर उपर्युक्त श्लोक का वास्तविक अर्थ यह समझना चाहिये कि-रात्रि में दही कभी नहीं खाना चाहिये, यदि
खाना ही हो तो घी, शक्कर या मूँग की दाल वा शहद किंवा आँवला के बिना अथवा गरम न खाय, इससे यह सिद्ध
हुआ कि-घी, शक्कर आदि से युक्त दही रात्रि में भी खायें।
❖ तथा चं
शस्यते दधि नो रात्रौ शस्तं चाम्बुघृतान्वितम्। रक्तपित्तकफोत्थेषु विकारेषु तु नैव तत् ।।१।।
तथा इसी विषय में और भी कहा है कि-रात्रि में दही खाना उचित नहीं है किन्तु यदि जल तथा घी मिला हुआ
हो तो खाना उचित है। किन्तु रक्त, पित्त तथा कफ सम्बन्धी विकारों में वह भी अर्थात् जल तथा घी से मिला हुआ भी
दही खाना उचित नहीं होता है अर्थात् अहितकर होता है। [१]
तद् = अम्बुघृतान्वितमपि (।।१।।) ।।१७।।
यहाँ पर “तत्” पद का “वह भी अर्थात् जल तथा घी से मिला भी “दही” यह अर्थ समझना चाहिये
(।।१।।) । [१७]
अथ ऋतुविशेषेण दध्नो विधिनिषेधावाह
हेमन्ते शिशिरे चापि वर्षासु दधि शस्यते। शरद्ग्रीष्मवसन्तेषु प्रायशस्तद्विगर्हितम् ।।१८।।
ऋतु विशेष में दही खाने की विधि तथा निषेध-हेमन्त (अगहन-पूस), शिशिर (माघ-फागुन) तथा वर्षा
(सावन-भादो) ऋतु में दही खाना उत्तम है। शरद् (क्वार-कार्तिक), ग्रीष्म (जेठ-आषाढ़) तथा (चैत-वैशाख) ऋतु में
दही खाना प्रायः करके निन्दित है अर्थात् निषिद्ध है। [१८]
अथ विधिमन्तरेण दधिसेवने दुर्गुणानाह
ज्वरासृक्पित्त वीसर्पकुष्ठपाण्ड्वामयभ्रमान्। प्राप्नुयात्कामलां चोग्रां विधिं हित्वा दधिप्रियः ।।१९।।