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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 933

८८२ भावप्रकाशनिघण्टुः
भर कर उसके ऊपर कपड़ा रख कर उसी के ऊपर रख कर माप से सिद्ध कर ले। जब तैयार हो जाय तब उसके बड़े-
बड़े गोले कर, बरे बनाकर उसी के अन्दर पूर्वोक्त चूर्ण किये हुये पदार्थों को भर तैल में पका डाले, जब तैयार हो जाय
तब कढ़ी में भिगो दे। भींग जाने पर इसी को पाकविद्या में कुशल लोग अदरक बड़ा कहते हैं।
अदरक बड़ा-रुचिकारक, लघु, बलकारक, अग्निदीपक, तृप्तिकारक, पथ्या तथा तीनों दोषों में ही उत्तम होता
है अर्थात् हानिकारक नहीं होता है। [७३-७७]
अथ वेसनम् (वेसन)। तस्य साधनमाह
दाल्यश्चणकानां तु निस्तुषा यन्त्रपेषिताः। तच्चूर्णं वेसनं प्रोक्तं पाकशास्त्रविशारदैः ॥७८॥
बेसन बनाने की विधि-बिना छिलके की चने की दाल को चक्की में पीसकर आटा तैयार करले। इसी को
पाकशास्त्र (रसोई बनाने की विद्या) में निपुण लोग बेसन कहते हैं। [७८]
अथ वेसनवटिका (फुलौरी)। तस्या साधनं गुणाँश्चाह
वटिकावेसनस्यापि क्वयितायां निमज्जिता। रुच्या विष्टम्भजननी बल्या पुष्टिकरी स्मृता ॥७९॥
फुलौरी बनाने की विधि-बेसन की बरी बनाकर यदि कढ़ी में भिगो दी जाय तो उसे फुलौरी कहते हैं।
फुलौरी-रुचिकारक, विष्टम्भजनक, बल तथा पुष्टि करने वाली होती है। [७९]
❖ एवमन्येऽपि वेसनभवाः प्रकाराः खण्डनखण्डप्रभृतयो बोद्धव्याः ॥७९॥
इस प्रकार से अन्य भी बेसन से बनाये जाने वाले खण्डन आदि पदार्थों के बनाने की विधियाँ होती हैं। उन्हें स्वयं
समझ लेना चाहिये। ग्रन्थ बढ़ जाने के भय से नहीं लिखी जा रही हैं। [७९]
अथ मांसस्य प्रकाराः। तत्र शुद्धमांसम्। तस्य प्रकारमाह
पाकपात्रे घृतं दद्यात्तैलञ्च मदभावतः। तत्र हिङ्गुहरिद्रां च भर्जयेत्तदनन्तरम् ॥८०॥
छागादेरस्थिरहितं मांसं तत्खण्डितं ध्रुवम्। धौतं निर्गालितं तस्मिन्नृते तद्भर्जयेच्छनैः ॥८१॥
सिद्धयोग्यं जलं दत्वा लवणन्तु पचेत्ततः। सिद्धे जलेन सम्पिष्य वेशवारं परिक्षिपेत् ॥८२॥
मांस बनाने के प्रकारों में प्रथम शुद्ध मांस बनाने की विधि-मांस बनाने के पात्र में प्रथम घी अथवा अभाव में तेल
ही डाल कर उसमें हींग और हरदी डाल कर भूने, तत्पश्चात् बकरे आदि का मांस लेकर उसके टुकड़े कर डाले, यदि
हड्डियाँ हों तो उन्हें फेंक दे, पुनः उन टुकड़ों को धोकर तथा जल खूब निथारकर उपर्युक्त घी अथवा तेल में धीरे-धीरे
भूने और सिद्ध होने योग्य जल छोड़ कर तथा सेंधा नमक मात्राऽनुसार डालकर पकावे, जब पक जाय तब जल के साथ
वेशवार पीस कर उसी में छोड़ दें। [८०-८२]
अथ वेशवरः (पिसा हुआ मसाला)। तद्द्रव्याण्याह
द्रव्याणि वेशवारस्य नागवल्लीदलानि च। तण्डुलाश्च लवङ्गानि मरिचानि समासतः ॥८३॥
वेशवार के द्रव्य-पान के पत्ते, चावल, लौंग, मरिच ये सब संक्षेप में वेशवार में पड़ने वाले द्रव्य हैं। [८३]
वेशवार "वेगर" इति लोके ॥८३॥
यहाँ पर "वेशवार" से लोक प्रसिद्ध "वेगर" समझना चाहिये। [८३]