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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 93

४० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
तथा चोक्तं तन्त्रान्तरे-
अग्निर्भिन्नगुणैर्युक्तः पित्तं भिन्नगुणैस्तथा ।।१३।।
द्रवं स्निग्धमधोगञ्च पित्तं वह्निरतोऽन्यथा। तस्मात्तेजोमयं पित्तं पित्तोष्मा यः स शक्तिमान् ।।१४।।
स सञ्चरति कुक्षिस्थःसर्वतो धमनीमुखैः। सकायाग्निः स कायोष्मा सपक्ता स च जीवनम् ।।
अनन्यगतिरित्येवं देहे कायाग्निरुच्यते ।।१५।।
अब इस जगह यह शङ्का होती है कि यदि पित्त और अग्नि का अभेद है अर्थात् दोनों एक हैं तो क्यों घृत पित्त
का शमन करनेवाला तथा अग्नि का दीपन करनेवाला होता है तथा मत्स्य पित्त का उत्पन्न करनेवाला होता है किन्तु अग्नि
का दीपन करनेवाला नहीं होता। पित्त की अधिकता से अग्नि तीक्ष्ण होता यह भी कैसे होता है तथा जिसके दोष समान
होते हैं अर्थात् कोई दोष न्यूनाधिक रूप से नहीं रहते हैं तो उसका अग्नि सम (न विषम और न मन्द) होता है यह भी
कहना ठीक नहीं हो सकता तथा 'पित्त द्रव (पतला)', स्निग्ध (स्नेह युक्त) और अधोगामी होता है किन्तु अग्नि इसके
विपरीत (द्रवत्वादि रहित) यह भी कहना कैसे ठीक हो सकता ? इसका उत्तर यह है कि पित्त अग्नि के निरन्तर रूप
से रहने का स्थान है और इसी विषय को लेकर दूसरे तन्त्रों में मुनियों ने कहा है- 'अग्नि और पित्त भिन्न गुणों से युक्त
है अर्थात् अग्नि और पित्त के गुण भिन्न-भिन्न हैं। अतएव उसमें से पित्त-द्रव, स्निग्ध और अधोगामी है अग्नि उस (पित्त)
से विपरीत है, इसीसे पित्त तेजोमय है तथा पित्त की जो ऊष्मा है वह शक्तिमान् है और वह उदर में स्थित होकर भी
धमनियों के द्वारा शरीर में चारों ओर सञ्चार करता रहता है। वही शरीर की अग्नि और गर्मी है तथा वही पचानेवाला
प्राणियों का जीवन है और वही देह के बीच में उसके समान अन्य किसी की गति नहीं है, अतएव वह कायाग्नि कहलाता
है' ।।१३-१५।।
अन्यच्च-वामपार्श्वाश्रितं नाभेः किञ्चित् सोमस्य मण्डलम् ।।१६।।
तन्मध्ये मण्डलं सौर्यं तन्मध्येऽग्निर्व्यवस्थितः। जरायुमात्रप्रच्छन्नः काचकोशस्थदीपवत् ।।१७।।
ग्रन्थान्तरों में और भी लिखा है-'नाभि वे वाम भाग में अत्यन्त छोटा सा एक चन्द्रमण्डल है, फिर उसके मध्य
में सूर्यमण्डल है और उस सूर्यमण्डल के मध्य में अग्नि स्थित रहता है तथा वह काँच (शीशे) के कोश (चिमनी) के
मध्य में स्थित दीप की भाँति जरायु मात्र से ढँका हुआ है' ।।१६-१७।।
तथा च मधुकोषे-❖ 'द्रवतेजः समुदायात्मकस्यापि पित्तस्य तेजोभागोऽग्निरि'ति । तेन पित्तमप्यग्निवन्मन्यते ।
अतितापितायोगोलकवत्। परमार्थतस्तु-अग्निः पित्ताद्भिन्न एवेति सिद्धान्तः ।।
अत एवाह रसप्रदीपे-
'जाठरो भगवानग्निरीश्वरोऽन्नस्य पाचकः। सौक्ष्म्याद्रसानाऽऽददानो विवक्तुं नैव शक्यते ।।१८।।
नाभिमध्ये १ शरीरस्य विशेषात्सोममण्डलम्। सोममण्डलमध्यस्थं विद्यात्सूर्यस्य मण्डलम् ।।१९।।
प्रदीपवत्तन्न नृणां स्थितो मध्ये हुताशनः। सूर्यो दिवि यथा तिष्ठस्तेजोयुक्तैर्गभस्तिभिः ।।२०।।
विशोषयति सर्वाणि पल्वला निसरांसि च। तद्वच्छरीरिणां भुक्तं ज्वलनो नाभिमाश्रितः ।।२१।।
मयूखैः पचते क्षिप्रं नानांव्यञ्जनसंस्कृतम्। स्थूलकायेषु सत्त्वेषु यवमात्रः प्रमाणतः ।।२२।।
ह्रस्वकायेषु सत्त्वेषु तिलमात्रः प्रमाणतः। कृमिकीटपतङ्गेषु बलामात्रोऽवतिष्ठतेः ।।२३।।
'मधुकोश' में भी यह कहा है कि- 'द्रव के रूप में स्थित जो तेज है उसके समूहरूप से स्थित पित्त का जो तेजोभाग
है वही अग्नि है' इससे पित्त को भी अग्नि की भाँति मुनि लोग मानते हैं, जैसे कि अत्यन्त तपाये हुये लोहे.के गोले
को भी अग्नि की तरह लोग मानते हैं। वस्तुतस्तु अग्नि पित्त से भिन्न ही है यही सिद्धान्त है। इसीसे 'रसप्रदीप' में भी
१. 'नाभा'विति पाठान्तरम्।