भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८७० भावप्रकाशनिघण्टुः
अथ शष्कुली (सौरी) । तस्या मांसगुणानाह
शष्कुली ग्राहिणी हृद्या मधुरा तुवरा स्मृता ।।११२।।
सौरी मछली का मांस-ग्राही, हृदय के लिये हितकर और मधुर तथा कषाय रस युक्त होता है । [११२]
अथ गर्गरः (गर्गरा) । तस्य मांसगुणानाह
गर्गरः पित्तलः किञ्चिद्वातजित्कफकोपनः ।।११३।।
गर्गरा मछली का मांस-पित्तजनक, किञ्चित् वातनाशक एवम् कफ को कुपित करने वाला होता है । [११३]
अथ कविका । तस्या मांसगुणानाह
कविका मधुरा स्निग्धा कफघ्नी रुचिकारिणी । कञ्चित्पित्तकरी वातनाशिनी वह्निवर्द्धिनी ।।११४।।
कविका मछली का मांस-मधुर रस युक्त, स्निग्ध, कफनाशक, रुचिकारक, किञ्चित् पित्तकारक, वातनाशक
एवम् जठराग्नि को बढ़ाने वाला होता है । [११४]
अथ वर्मिमत्स्यः (वर्मी) । तस्य मांसगुणानाह
वर्मिमत्स्यो हरेद्वातं पित्तं रुचिकरो लघुः ।।११५।।
वर्मी मछली का मांस-वात तथा पित्त को दूर करने वाला, रुचिकारक एवम् लघु होता है । [११५]
अथ दण्डमत्स्यः । तस्य मांसगुणानाह
दण्डमत्स्यो रसे तिक्तः पित्तरक्तं कफ हरेत् । वातसाधारणः प्रोक्तः शुक्रलो बलवर्द्धनः ।।११६।।
दण्ड मछली का मांस-तिक्त रस युक्त, पित्तरक्त तथा कफ को दूर करने वाला, वायु के लिये साधारण,
शुक्रजनक तथा बलवर्द्धक होता है । [११६]
अथैरङ्गः तस्य मांसगुणानाह
एरङ्गो मधुरः स्निग्धो विष्टम्भी शीतलो लघुः ।।११७।।
एरङ्ग मछली का मांस-मधुर रस युक्त, स्निग्ध, विष्टम्भ करने वाला, शीतल तथा लघु होता है । [११७]
अथ महाशफरः (पपंता) । तस्य मांसगुणानाह
महाशफरसंज्ञस्तु तिक्तः पित्तकफापहः । शिशिरो मधुरो रुच्यो वातसाधारणः स्मृतः ।।११८।।
महाशफरी मछली का मांस-तिक्त तथा मधुर रसयुक्त, पित्त तथा कफनाशक, शीतल, रुचिकारक एवम् वात
के लिये साधारण होता है । [११८]
अथ गरघ्नी । तस्या मांसगुणानाह
गरघ्नी मधुरा तिक्ता तुवरा वातपित्तहृत् । कफघ्नी रुचिकृल्लघ्वी दीपनी बलवीर्यकृत् ।।११९।।
गरघ्नी मछली का मांस-मधुर-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, वात पित्त तथा कफ नाशक, रुचिकारक, लघु, अग्निदीपक
एवम् बल तथा वीर्य को उत्पन्न करने वाला होता है । [११९]
अथ मद्गुरः । तस्य मांसगुणानाह
मद्गुरो वातहृद् बल्यो वृष्यः कफकरो लघुः ।।१२०।।