भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 917, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें८६६ भावप्रकाशनिघण्टुः
अथ मेषः (मेढा) । तस्य नामान्यण्डविहीनस्य तस्य च मांसगुणाँश्चाह
मेढ्रो मेढो हुडो मेष उरणोऽप्येडकोऽपि च । अविर्वृष्णिस्तथौर्णायुः कथ्यन्ते तद्गुणा अथ ॥८०॥
मेषस्य मांसं पुष्टौ स्यात्पित्तश्लेष्मकरं गुरु । तस्यैवाण्डविहीनस्य मांसं किञ्चिल्लघु स्मृतम् ॥८१॥
मेढा के संस्कृत नाम-मेढ्र, मेढ, हुड, मेष, उरण, एडक, अवि, वृष्णि और ऊर्णायु ये सब हैं।
मेढे का मांस-पुष्टि के लिये उत्तम, पित्त तथा कफ को उत्पन्न करने वाला एवम् गुरु होता है। अण्डकोश
निकाले हुये (बधिया किये हुये) मेढे का मांस-किञ्चित् लघु होता है और शेष गुण पूर्वोक्त होते हैं। [८०-८१]
अथैडकः । (दुम्बा मेढा) । तस्य नामानि तद्भेदस्य च मांसगुणाँश्चाह
एडकः पृथुशृङ्गः स्यान्मेदःपुच्छस्तु दुम्बकः । एडकस्य पलं ज्ञेयं मेषामिषसमं गुणैः ॥८२॥
मेदःपुच्छोद्भवं मांसं हृद्यं वृष्यं श्रमापहम् । पित्तश्लेष्मकर किञ्चिद्वातव्याधिविनाशनम् ॥८३॥
एडक अर्थात् मोटी सींग वाले मेढा का संस्कृत नाम-एडक और पृथुशृङ्ग है। इसकी सींग बड़ी मोटी होती
है। दुम्बा मेढ़ा का संस्कृत नाम-मेदःपुच्छ तथा दुम्बक है। इसकी पूँछ मेद बढ़ जाने से बड़ी चौड़ी हो जाती है। एडक
संज्ञक मेढ़े का मांस-गुणों में पूर्वोक्त मेढ़े के मांस के समान ही समझना चाहिये। दुम्बा मेढ़े का मांस-हृदय को
हितकर, वीर्यवर्धक, श्रम को दूर करने वाला, पित्त तथा कफ कारक एवम् किञ्चित् वातरोग को नष्ट करने वाला होता
है। [८२-८३]
अथ वृषभः (बैल) । तस्य नामानि मांसगुणानाह
बलीवर्दस्तु वृषभः ऋषभश्च तथा वृषः । अनड्वांन्सौरभेयोऽपि गौरुक्षा भद्र इत्यपि ॥८४॥
सुरभिः सौरभेयी च माहेयी गौरुदाहता । गोमांसं सुगुरु स्निग्धं पित्तश्लेष्मविवर्द्धनम् ।।
बृंहणं वातहृत् बल्यमपथ्यं पीनसप्रणुत् ।।८५।।
बैल के संस्कृत नाम-बलीवर्द, वृषभ, ऋषभ, वृष, अनड्वान् (अनडुह), सौरभेय, गौः (गो), उक्षा (लक्षण)
तथा भद्र ये सब हैं। गौ के संस्कृत नाम-सुरभि, सौरभेयी, माहेयी तथा गौः (गो) ये सब कहे हुये हैं।
गोमांस-अत्यन्त गुरु, स्निग्ध, पित्त तथा कफ को बढ़ानेवाला, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), वात को दूर करने
वाला, बलकारक, अस्वस्थों के लिये अपथ्य तथा पीनस रोग नाशक होता है। [८४-८५]
अथाश्वः (घोड़ा)। तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह
घोटकेऽप्यश्वस्तुरगास्तुरङ्गमाश्च तुरङ्गाः। बाजिवाहार्वगन्धर्वहयसैन्धवसप्तयः ॥८६॥
अश्वमांसन्तु तुवरं वह्निकृत्कफपित्तलम्। वातहृद् बृंहणं बल्यं चक्षुष्यं मधुरं लघु ॥८७॥
घोड़े के संस्कृत नाम-घोटक, अश्व, तुरग, तुरङ्ग, तुरङ्गम, बाजि, वाह, अर्व (अर्वन्) गन्धर्व, हय, सैन्धव तथा
सप्ति ये सब हैं।
घोड़े का मांस-कषाय तथा मधुर रस युक्त, अग्निकारक, कफ तथा पित्त को उत्पन्न करने वाला, वातनाशक,
बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), बलकारक, नेत्रों के लिये हितकर तथा लघु होता है। [८६-८७]
अथ कूलेचराः । तत्रः महिषः (भैंसा)।
तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह
महिषो घोटकारिः स्यात्कासरश्च रजस्वलाः ॥८८॥
पीनस्कन्धः कृष्णकायो लुलायो यमवाहनः । महिषस्यामिषं स्वादु स्निग्धोष्णं वातनाशनम् ॥८९॥
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