भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 913, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंभावप्रकाशनिघण्टुः
८६२
अथ मुण्डी । तस्य मांसगुणानाह
मुण्डी तु ज्वरकासास्रक्षयश्वासापहो हिमः ।।४९।।
मुण्डी मृग का मांस-शीतल तथा ज्वर, खांसी, रक्तविकार, क्षय और श्वास को दूर करने वाला होता है । [४९]
अथ बिलेशयाः । तत्र शशः (खरगोश) । तस्य नामानि मांसगुणांश्चाह
लम्बकर्णः शशः शूली लोमकर्णो बिलेशयः । शशः शीतो लघुग्राही रूक्षः स्वादुः सदा हितः ।।
वह्निकृत्कफपित्तघ्नो वातसाधारणः स्मृतः । ज्वरातीसारशोषास्रश्वासामयहरश्च सः ।। ५० ।।
बिलेशय संज्ञक जीवों में खरगोश के संस्कृत नाम-लम्बकर्ण, शश, शूली, लोमकर्ण तथा बिलेशय ये सब
हैं।
खरगोश का मांस-शीतल, लघु, ग्राही, रूक्ष, स्वादिष्ट, सभी ऋतुओं में हितकर, जठराग्नि को प्रज्वलित करने
वाला, कफ तथा पित्त नाशक, साधारण वात कारक एवम्-ज्वर, अतिसार, शोष, रक्तविकार तथा दमा को दूर करने
वाला होता है । [५०]
अथ सेधा (सेह, साही) । तस्या नामानि मांसगुणांश्चाह
सेधा तु शल्यकः श्वावित्कथ्यन्ते तद्गुणा अथ । शल्यकः श्वासकासास्रशोषदोषत्रयापहः ।। ५१ ।।
साही के संस्कृत नाम-सेंधा, शल्यक और श्वावित् ये सब हैं ।
साही के मांस-श्वास, खाँसी, रक्तविकार, शोष तथा त्रिदोष को दूर करनेवाला होता है । [५१]
अथ पक्षिणः (पक्षी) । तेषां नामानि मांसगुणाँश्चाह
पक्षी खगो विहङ्गश्च विहगश्च विहङ्गमः । शकुनिर्विः पत्रत्री च विष्करो विकिरोऽण्डजः ।।
धान्याङ्कुरचरा येऽत्र तेषां मांसं लघूत्तमम् । आनूपं बलकृन्मांसं स्निग्धं गुरुतरं स्मृतम् ।। ५१ ।।
पक्षी के संस्कृत नाम-पक्षी, खग, विहङ्ग, विहग, विहङ्गम, शकुनि, वि, पत्रत्री, विष्किर, विकिर तथा अण्डज
ये सब हैं ।
पक्षियों में जो धान के अङ्कुर चरने वाले हैं, उनका मांस-हल्का तथा उत्तम होता है । आनूप अर्थात् जल
के किनारे रहने वाले पक्षियों का मांस-बलकारक, स्निग्ध तथा अत्यन्त गुरु होता है । [५२]
अथ तेषु विष्किरेषु वर्त्तकः (बटेर) । तस्य नामानि मांसगुणाँश्चाह
वर्त्तीको वर्त्तकश्चित्रस्ततोऽन्या वर्त्तका स्मृता । वर्त्तकोऽग्निकरः शीतो ज्वरदोषत्रयापहः ।
सुरुच्यः शुक्रदो बल्यो वर्त्तकाऽल्पगुणा ततः ।। ५३ ।।
पूर्वोक्त विष्किर संज्ञक पक्षियों में वर्त्तक अर्थात् बटेर के संस्कृत नाम-वर्त्तीक, वर्त्तक तथा चित्र ये सब
हैं । इससे अन्य प्रकार का एक बटेर होता है जिसे संस्कृत में "वर्त्तका" कहते हैं ।
बटेर का मांस-जठराग्निकारक, शीतल, सुरुचिकारक, शुक्र उत्पन्न करने वाला, बलकारक एवम्-ज्वर तथा
त्रिदोष को नष्ट करने वाला होता है । और दूसरे प्रकार का जो बटेर है उसका मांस-पूर्वोक्त बटेर के मांस की अपेक्षा स्वल्प
गुण वाला होता है । [५३]