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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 907

८५६ भावप्रकाशनिघण्टुः
आनूप मांस के भेद— (१) कूलेचर (नदी आदि के किनारे पर चलने वाले), (२) प्लव (जल के ऊपर तैरने वाले
पक्षी), (३) कोशस्थ (ढकने के मध्य में रहने वाले), (४) पादो (पाँव वाले जल के जीव), (५) मत्स्य (मछली), ये
५ प्रकार की जातियाँ आनूप कहलाती हैं।
आनूपमांस— मधुररसयुक्त, स्निग्ध, गुरु, जठराग्नि को मन्द करने वाला, कफ उत्पन्न करने वाला, पिच्छिल, मांस
को अत्यन्त पुष्ट करने वाला, अभिष्यन्दी तथा प्रायः करके अत्यन्त पथ्य होता है। [७-८]
अथ जाङ्गलाः । तत्र जङ्घालानां गणनां लक्षणानि विशिष्टगुणाँश्चाह
हरिणैणकुरङ्गर्य्यपृषतन्यङ्कुशम्बराः ।।९।।
राजीवोऽपि च मुण्डी चेत्याद्या जङ्घालसंज्ञकाः । हरिणस्ताम्रवर्णः स्यादेणः कृष्णः प्रकीर्त्तितः ।।१०।।
कुरङ्गईषत्ताम्रः स्यादेणतुल्याकृतिर्महान् । ऋष्यो नीलाङ्गको लोके स रोझ इति कीर्त्तितः ।।११।।
पृषतश्चन्द्रबिन्दुः स्याद्धरिणात्किञ्चिदल्पकः । न्यङ्कुर्बहुविषाणोऽथ शम्बरो गवयो महान् ।।१२।।
राजीवस्तु मृगो ज्ञेयो राजिभिः परितोवृतः । यो मृगः शृङ्गहीनः स्यात्स मुण्डीति निगद्यते ।।१३।।
जङ्घालाः प्रायशः सर्वे पित्तश्लेष्महराः स्मृतः । किञ्चिद्वातकराश्चापि लघवो बलवर्द्धनाः ।।१४।।
जाङ्गल जीवों में प्रथम जङ्घाल संज्ञक जीवों की गणना—हरिण, एण, कुरङ्ग, ऋष्य, पृषत, न्यङ्कु, शम्बर,
राजीव और मुण्डी इत्यादि जंघालसंज्ञक जीव हैं।
लक्षण—हरिण— यह ताँबे के समान वर्णवाला मृग होता है। एण— यह कृष्ण वर्ण का मृग होता है। कुरङ्ग—
यह किंचित् ताँबे के समान वर्ण वाला, आकार में एण मृग के समान किन्तु उससे बड़ा होता है। ऋष्य— यह नीले वर्ण
का होता है, इसे लोक में "रोझ" कहते हैं। पृषत— इसके ऊपर चन्द्र के समान बिन्दु होते हैं और यह हरिण से कुछ
छोटा होता है। न्यङ्कु— इसके बहुत से झाड़दार सींग होते हैं, इसे "बारहसिंगा" कहते हैं। शम्बर— यह गवय (गौ के
समान पशुविशेष-नीलगाय) की अपेक्षा बड़ा होता है। राजीव— यह मृग कहलाता है जिसके शरीर पर बहुत सी रेखायें
हों। मुण्डी— यह मृग (हरिण) सींग से रहित होता है।
जङ्घाल जीवों के मांस— प्रायः करके पित्त तथा कफ नाशक, किंचित् वातकारक, लघु तथा बलवर्धक होते
हैं। [९-१४]
अथ बिलेशयाः (बिलनिवासी प्राणी) तेषां गणनां गुणाँश्चाह
गोधाशशभुजङ्गाखुशल्लक्याद्या बिलेशयाः । बिलेशया वातहरा मधुरा रसपाकयोः ।।
बृंहणा बद्धविण्मूत्रा वीर्य्योष्णाश्च प्रकीर्त्तिताः ।।१५।।
बिलेशय (बिल में रहने वाले) प्राणियों की गणना— गोह, खरगोश, साँप, मूसा, साही आदि जीव बिलेशय
कहलाते हैं।
बिलेशय जीवों का मांस— वात नाशक, रस तथा विपाक में मधुर, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), उष्णवीर्य, मल
तथा मूत्र का विबन्ध करने वाला होता है। [१५]
अथ गुहाशयाः (गुफानिवासी प्राणी) । तेषां गणनां गुणाँश्चाह
सिंहव्याघ्रवृका ऋक्षतरक्षुद्वीपिनस्तथा । बभ्रुजम्बुकमार्जार इत्याद्याः स्युर्गुहाशयाः ।।१६।।
गुहाशय (गुफा में रहने वाला) जीवों की गणना— सिंह, बाघ, भेड़िया, भालू, तरस (लकड़बग्घा), चित्रव्याघ्र
(चीता), बभ्रु (नेवला), गीदड़, बिलार इत्यादि गुहाशय जीव हैं। [१६]
❖ तरक्षुः— "तेंदुआबाघ" इति लोके । द्वीपी = "चित्रव्याघ्र" इति लोके ।