भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 896, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें(१) अर्श में इसका बहुत उपयोग किया जाता है। इससे यकृत् की क्रिया ठीक होती है, शौच साफ होता है तथा
अर्श की रक्तवाहिनियों का संकोचन होता है। इसका पुटपाक करके फिर साग बनाना चाहिये या चूर्ण करके रखना चाहिये।
कांजी में संधान करके रखने से यह अधिक गुण वाला होता है। पर्याप्त धोने से तथा अधिक पकाने से भी इसका दोष
दूर होता है। कच्चे सूरण के प्रयोग से मुह में खुजली आदि होती है जिसके निवारण के लिए इमली आदि अम्ल पदार्थ
का उपयोग करना चाहिये।
(२) आंत्र के रोगों में इसका शाक देते हैं।
मात्रा-चूर्ण १ से ३ माशा।
अथालुकम् (आलुक) । तस्य नामानि भेदांश्चाह
आरूकं वीरसेनञ्च वीरं वीरारुकं तथा। आरुकमप्यालुकं तत्कथितं वीरसेनकम् ।। ९४ ।।
काष्ठालुकशङ्खालुकहस्त्यालुकानि कथ्यन्ते। पिण्डालुकमध्वालुक १रक्तालुकानि चोक्तानि ।। ९५ ।।
आलुक के संस्कृत नाम-आरूक, वीरसेन, वीर, वीरारुक, आरुक, आलुक तथा वीरसेनक ये सब हैं। भेद-
(१) काष्ठालुक, (२) शंखालुक, (३) हस्त्यालुक, (४) पिण्डालुक, (५) मध्वालुक, (६) रक्तालुक ये सब आलू के
भेद हैं। [९४-९५]
❖ काष्ठालुकं = काठिन्ययुक्तम् (कठालू)। शङ्खालुकं = श्वेततायुक्तम् (शङ्खालू)। हस्त्यालुकं = दीर्घतायुक्तं
महाशरीरम्। पिण्डालुकं = वर्तुलम् (सुथनी, पिण्डालू)। मध्वालुकं = मधुरतायुक्तं रोमान्वितम् (दीर्घसुथनी)।
रक्तालुकम् = ("रक्तालू, रतालू, रतण्डा" इति च) ।। ९४-९५ ।।
यहाँ पर काष्ठालुक आदि का निम्नलिखित अर्थ समझना चाहिये।
काष्ठालुक-यह कठिनतायुक्त होता है। इसे हिन्दी में "कठालू" कहते हैं।
शंखालुक-यह सफेदी लिये हुये होता है, इसका हिन्दी नाम "शंखालू" है।
हस्त्यालुक-यह लम्बाई लिये हुये आकार में अत्यन्त बड़ा होता है।
पिण्डालुक-यह गोल होता है, इसे लोक में सुथनी या पिण्डालू कहते हैं।
मध्वालुक-यह मीठापन लिये हुये होता है तथा इसके ऊपर लम्बे-लम्बे रोवें होते हैं। हिन्दी में इसे "दीर्घ सुथनी"
कहते हैं।
रक्तालुक-यह लाल रंग का होता है, इसे लोक में "रक्तालू-रतालू या रतण्डा" कहते हैं।
अथालुकमात्रगुणानाह
आलुकं शीतलं सर्वं विष्टम्भि मधुरं गुरु ।। ९६ ।।
सृष्टमूत्रमलं रूक्षं दुर्जरं रक्तपित्तनुत्। कफानिलकरं बल्यं वृष्यं २स्वल्पाग्निवर्द्धनम् ।। ९७ ।।
सभी प्रकार के आलुक-शीतल, विष्टम्भजनक, मधुर रसयुक्त, गुरु, मूत्र तथा मल को निकालने वाले, रूक्ष,
देर में हजम होने वाले, कफ तथा वायु को उत्पन्न करने वाले, बलकारक, वीर्यवर्धक, किंचित् जठराग्नि को बढ़ानेवाले
एवम् रक्तपित्त को नष्ट करने वाले होते हैं। [९६-९७]
१. सप्तालुक इति पाठ०।
२. स्तम्भिवर्धनम् इति पाठ०।