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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 886, कुल 1167 में से

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पृष्ठ 886

शाकवर्गः ८३५

गुण और प्रयोग—इसके बीज शीतल होते हैं।
अथ कारवेल्लं कारवेल्ली च (करेला, करेंली) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह
कारवेल्लं कठिल्लं स्यात्कारवेल्ली ततो लघुः । कारवेल्लं हिमं भेदि लघु तिक्तमवातलम् ।।६२।।
ज्वरपित्तकफास्रघ्नं पाण्डुमेहकृमीन् हरेत् । तद्गुणा कारवेल्ली स्याद्विशेषाद्दीप्नी लघुः ।।६३।।
करेला के संस्कृत नाम—कारवेल्ल तथा कठिल्ल हैं। करेली का संस्कृत नाम—कारवेल्ली है। यह करेला की
अपेक्षा छोटी होती है। करेला—तिक्त रसयुक्त, शीतल, मलभेदक, लघु, किंचिद् वातजनक होता है और ज्वर, पित्त,
कफ, रक्तविकार, पाण्डु, प्रमेह तथा कृमि का नाशक होता है।
करेली—इसके गुण उक्त करेला की भाँति होते हैं किन्तु विशेष कर यह अग्निदीपक तथा लघु होती
है। [६२-६३]
४३. करेला
हिं०—करेला, करैला, करइला, करेली। बं०—करोला, बड़ा मसिया, उच्छे। म०—कारलें, कारली। गु०—
कारेला, करेलुं। क०—हागल। ते०—काकर। ता०—पागल। फा०—कारेलाह। अ०—किस्सा उल्हिमार, कसायुल
हिमार। अं०—Carilla Fruit (कॅरिल्ला फ्रूट); (विटर गोर्ड)। ले०—Momordica charantia Linn. (मोमोर्डिका
चेरण्टिआ)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी)।
प्रायः सब प्रान्तों में इसे रोपण करते हैं। इसकी लता—मृदुरोमश होती है। पत्ते—१ से ५ इञ्च के घेरे में गोलाकार,
गहरे कटे किनारे वाले एवं ५-७ भागों में विभक्त रहते हैं। फूल—चमकीले पीले रंग के आते हैं। फल—१ से ५ इञ्च
लम्बे, बीच में मोटे तथा दोनों तरफ नोकीले, त्रिकोणाकृति उभारों के कारण ऊबड़ खाबड़, हरे किन्तु पकने पर पीले
रंग के हो जाते हैं। बीज—चिपटे होते हैं।
इसके कृषिजन्य अनेक प्रकार, आकार तथा नाप के अनुसार पाये जाते हैं जिनमें से छोटे फल को करेली कहते
हैं। इसके कड़वे स्वाद को कम करने के लिये सब्जी बनाने के पूर्व नमक के जल में इसे भिगोकर रखते हैं।
रासायनिक संगठन—इसमें गंधयुक्त उड़नशील तैल, कॅरोटीन, ग्लूकोसाइड, सॅपोनिन् एवं मोमोरिडिसाइन
(Momoridicine) नामक क्षाराभ पाया जाता है। बीजों में ३२% विरेचक तेल होता है।
गुण और प्रयोग—इसके फल पित्तशामक, आनुलोमिक, कृमिघ्न एवं मूत्रजनन हैं। वृन्तयुक्त कोमल पत्ते कड़वे,
मूत्रजनन, वामक एवं विरेचक हैं। कभी-कभी इससे वमन विरेचन अधिक होता है उस समय उसके निवारण के लिये
घी भात खिलाना चाहिये। प्रयोग से देखा गया है कि खरगोश में इससे रक्तगत शर्करा की मात्रा कम हो जाती है। इस
आधार पर इसके मधुमेह में लाभदायक सिद्ध होने की संभावना है।
(१) यकृत् प्लीहावृद्धि के साथ जलोदर हो तथा विषम ज्वर हो तब इसके पत्तों का रस देते हैं।
(२) पित्तप्रकोप, श्वसनिका शोथ आदि में वमन कराने के लिये पत्र रस दिया जाता है।
(३) आमवात, वातरक्त, यकृत् प्लीहा वृद्धि एवं जीर्ण त्वचा के रोगों में बिना कड़वापन दूर किये फल की सब्जी
लाभदायक होती है।
(४) पुराने त्वचा के रोगों में पत्तों का लेप किया जाता है।
(५) इसकी जड़ के क्वाथ से गर्भपात हो सकता है।
मात्रा—स्वरस १ से २ ड्राम; बच्चों को ¼-१ ड्राम।