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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 875

८२४ भावप्रकाशनिघण्टुः
१६. चूका
हिं०-चूका (शाक) । बं०-चुका, पालंग । म०-चुका, आंबट चुका । गु०-चुको, खारी भाजी । क०-
हुलीचकोत । फा०-तुरश्क बड़ा, तुर्रे, खुरासानी, तरह हिरा साई । अ०-हुम्माज बुकलेहा मेजा, बुल्फ येह मिजई ।
अं०-Bladder Dock (ब्लैडर डॉक्) । ले०-Rumex vesicarius Linn. (रूमेक्स वेसिकेरियस्) । Fam.
Polygonaceae (पॉलिगोनेसी) ।
यह पश्चिम पंजाब और सिन्ध के आस-पास पहाड़ी जमीन में अधिक होता है और दूसरे प्रान्त में भी कहीं-कहीं
पाया जाता है । इसका क्षुप-६ से १२ इञ्च तक ऊँचा, पाण्डुर हरित, कुछ मांसल एवं मूल के पास से ही दो भागों
में बँटा रहता है । पत्ते-अंडाकार-लट्त्वाकार या आयताकार, १ से ३ इञ्च लम्बे, आधार स्फानवत् या हृद्वत् या दो
कोने निकले हुवे तथा लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं । पुष्प-श्वेत या गुलाबी होते हैं । इसके बीज यूनानी वैद्यक में तुख्म
हुम्माज नाम से व्यवहार में आते हैं । इसका साग बनाया जाता है ।
गुण और प्रयोग-यह दीपन, रुचिकर, सारक, शोथघ्न एवं वेदना स्थापन है । पचन नलिका के विकार में इसका
साग देते हैं । आमाशय में दाह, आँव, वमन एवं क्षुधा नाश आदि में इसे देते हैं ।
इसके बीज शीतल, ग्राही, लेसदार तथा दाह शामक होते हैं । इनका उपयोग पित्त विकार, पित्तातिसार, मूत्र मार्ग
में दाह एवं आमाशय शोथ में करते हैं ।
पत्तों का लेप सूजन पर तथा कीटदंश पर करते हैं । दंतशूल में भी रस लगाते हैं ।
अथ चञ्चुकी (भाफली) तस्या नामगुणानाह
चिञ्चा चञ्चुश्चञ्चुकी च दीर्घपत्रा सतिक्तका । चञ्चुः शीता सरा रुच्या स्वाद्वी दोषत्रयापहा ।।
धातुपुष्टिकरी बल्या मेध्या पिच्छिलका स्मृताः ।।२६।।
चञ्चुकी के संस्कृत नाम-चिञ्चा, चञ्चु, चञ्चुकी दीर्घपत्रा तथा सतिक्तका ये सब हैं ।
चंचु-स्वादिष्ट, शीतल, सारक, रुचिकारक, त्रिदोषनाशक, धातु को पुष्ट करनेवाला, बलदायक, मेधा के लिये
हितकर तथा पिच्छिल है । [२६]
१७. चंचु
हिं०-चंचु शाक, चोंच, (बा) माफली । बं०-बिलनलिता । म०-हरणखुरी, मगरमिठी । गु०-उमी बहुफली,
छुंछडी । ले०-Corchorus fascicularis Lam. (कोकोर्रस् फॅसीक्यूलेरिस) । Fam. Tiliaceae (टिलिएसी) ।
यह गरम प्रान्तों में अधिक उत्पन्न होता है । इसका क्षुप-एक ऊंचा, प्रसरणशील एवं वर्षायु होता है । पत्ते-
१-२ इञ्च लम्बे, पाव से आध इञ्च तक चौड़े, एकान्तर, आयताकार-भालाकार तथा दन्तुर होते हैं । फूल-पीले रंग के,
२ से ५ एक वृन्त पर पत्तों के सामने आते हैं । फलियाँ-मृदुरोमश, करीब ½ इञ्च लम्बी, ३-४ एक साथ एवं प्रत्येक
३-४ कोष्ठ युक्त होती हैं । बीज-अनेक, काले एवं कोनयुक्त होते हैं ।
इसके पंचांग का उपयोग किया जाता है ।
गुण और प्रयोग-यह उत्तम स्नेहन एवं बल्य है । इसका क्वाथ सोजाक में देते हैं जिससे पेशाब की मात्रा बढ़कर
जलन इत्यादि कम होती है ।
मात्रा-½ से १ तोला ।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA