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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 864, कुल 1167 में से

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धान्यवर्गः ८१३
तीनी के संस्कृत नाम—प्रसाधिकां, नीवार और तृणान्न ये सब हैं।
तीनी—शीतल, ग्राही, पित्तनाशक एवम् कफ तथा वातकारक है ॥८६॥
२८. तीनी
हिं०—तीनि, तीन्नी, जंगलीदाल। बं०—उडिधान्य। म०—देवभात। गु०—वंटो। क०—ज्वरहुमेधे। ते०—
निवोरीवट्टु। ता०—वल्लीपुल्लु। आसा०—फुटकी। ले०—Hygroryza aristata Nees. (हाइग्रोहाइझा एरिस्टेटा)।
Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)।
समस्त भारत में यह पाया जाता है। यह एक जलीय घास की जाति का पौधा है जो तालाबों या जलीय भूमि
पर फैला हुआ रहता है। वर्षा ऋतु में आसाम में चावल के खेतों पर यह फैला हुआ पाया जाता है। काण्ड १ से
१ १/२ फीट लम्बे होते हैं। इसके चावल को गरीब लोग खाते हैं। इस घास को जानवर खाते हैं।
गुण और प्रयोग—इसके चावल शीतल, ग्राही, सुपाच्य एवं पित्तशामक माने जाते हैं।
अथ यावनालः (पनेरा, जुआर) तस्य गुणानाह
यावनालो हिमः स्वादुर्लोहितः श्लेष्मपित्तजित्। अवृष्यस्तुवरो रूक्षः क्लेदकृत्कथितो लघुः ।।८७।।
जुआर (पनेरा) का संस्कृत नाम यावनाल है।
जुआर—स्वादिष्ट, कषाय रसयुक्त, शीतल, किंचित् वीर्यवर्द्धक, रूक्ष, क्लेदकारक, लघु एवम् रक्त विकार, कफ
तथा पित्त को नष्ट करने वाला होता है। [८७]
२९. जुआर
हिं०—जुआर, ज्वार, जुवार। बं०—जुयारा, जोयार। म०—जोंधले, ज्वारी। गु०—जुवार। क०—जोला।
ते०—जोन्नलु। ता०—चोलं। फा०—जुरेमका, जिर्रहमका, गावरस हिन्दी। अ०—हंतारुमिया खंदरूस, हिन्तये रूमिया।
ले०—Sorghum vulgare (Linn.) Pers. (सोर्घम् व्हलगेर्)। Fam. Gramineae (ग्रेमिनी)।
सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। क्षुप—वर्षायु, १० से १५ फीट ऊँचा; काण्ड १/२-२ १/२ इञ्च मोटा; पत्ते—
२ से ३ १/२ इञ्च लम्बे, १-३ इञ्च चौड़े, चिकने, किनारा खुरदरा तथा मध्य शिरा श्वेत; बाल-विभिन्न स्वरूप का रहता
है।
इसके अनेक भेदोपभेद होते हैं।
रासायनिक संगठन—इसमें प्रोटीन ९, कार्बोहाइड्रेट ७२, स्नेह २, रेशा २, राख २ तथा आर्द्रता १३ रहती
है। इसके पत्तों में हाइड्रोसायनिक ॲसिड पाया जाता है। बीजों में ग्लूकोसाइड धुरिन् (Dhurin) पाया जाता है।
गुण और प्रयोग—इसका अन्न के रूप में उपयोग किया जाता है। यह मूत्रजनन तथा कुछ वृष्य होता है।
अथ परिभाषामाह
धान्यं सर्वं नवं स्वादु गुरु श्लेष्मकरं स्मृतम्। तत्तु वर्षोषितं पथ्यं यतो लघुतरं हि तत् ।।८८।।
वर्षोषितं सर्वधान्यं गौरवं परिमुञ्चति। न तु त्यजति वीर्यं स्वं क्रमान्मुञ्चत्यतः परम् ।।८९।।
एतेषु यवगोधूमतिलमाषा नवा हिताः। पुराणा विरसा रूक्षा न तथा गुणकारिणाः ।।९०।।
धान्यविषयक परिभाषा—सभी प्रकार के धान्य यदि नवीन हों तो वे स्वादिष्ट, गुरु तथा कफकारक होते हैं। यदि
वे वर्ष भर के रक्खे पुराने हों तो पथ्य होते हैं क्योंकि वे अत्यन्त लघु हो जाते हैं। वर्ष भर के बाद जैसे-जैसे वे पुराने