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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 834

धात्वादिवर्गः ७८३
अथ विषम् । तस्य नाम भेदानाह
विषं तु गरलः च्वेडस्तस्य भेदानुदाहरे । वत्सनाभः सहारिद्रः सक्तुकश्च प्रदीपनः ।।
सौराष्ट्रिकः शृङ्गिकश्च कालकूटस्तथव च । हालाहलो ब्रह्मपुत्रो विषभेदा अमी नव ।।१९१।।
विष के संस्कृत नाम-विष (नपुंसकलङ्गी), गरल तथा क्ष्वेड ये सब हैं।
भेद-(१) वत्सनाभ, (२) हारिद्र, (३) सक्तुक, (४) प्रदीपन, (५) सौराष्ट्रिक, (६) शृङ्गिक, (७) कालकूट, (८)
हालाहल, (९) ब्रह्मपुत्र ये ९ भेद स्थावर विष के होते हैं। [१९१]
विषवर्ग
वक्तव्य-यहाँ पर विषों के ९ भेद बतलाये गये हैं जिनमें से वत्सनाभ एवं शृङ्गिक व्यवहार में प्रयोग में लाये
जाते हैं। अन्य विषों का व्यावहारिक ज्ञान लुप्तपाय है। वत्सनाभ एवं शृङ्गिक के नाम से जिन द्रव्यों का व्यवहार में
उपयोग किया जाता है वह एकोनाइट (Aconite) की विभिन्न जातियों (Species) के मूल हैं किन्तु इनका जो स्वरूप
निम्न मूल श्लोकों में वर्णन किया गया है वह एकोनाइट से पूर्ण रूप से मेल नहीं खाता। चूँकि एकोनाइट की और
भी अनेक विषैली जातियाँ पाई जाती हैं इसलिये संभव है कि उपर्युक्त विषों में से कुछ अन्य भेद भी इन्हीं में से हों।
इस संबन्ध में व्यापक अनुसंधान की आवश्यकता है।
तत्र वत्सनाभः । तस्य स्वरूपनिरूपणमाह
सिन्दुवारसदृक्पत्रो वत्सनाभ्याकृतिस्तथा । यत्पार्श्वे न तरोर्वृद्धिर्वत्सनाभः स भाषितः ।।१९२।।
वत्सनाभ विष के स्वरूप का वर्णन-जिसके पत्ते संभालू के पत्तों के समान हों तथा आकार बछड़े की नाभि
के समान हो और जिसके नजदीक दूसरे वृक्षों की वृद्धि न हो सकती हो उसे 'वत्सनाभ' समझना चाहिये । [१९२]
वक्तव्य-व्यवहार में जिस द्रव्य का उपयोग किया जाता है उससे उपर्युक्त वर्णन मेल नहीं खाता।
वत्सनाभ
हिं०-विष, मीठा विष, वच्छनाग, वचनाग, तेलिया विष । बं०-कठ विष, वत्सनाब विष, विष । म०-
बचनाग । गु०-बच्छनाग, वसनाग । क०-वसनाबी । ते०-नाभि, वसनाभि । पं०-मीठा विष । ता०-वत्सनाभि ।
अ०-विष । फा०-विषनाग, जहर । अं०-Aconite (एकोनाइट) । ले०-Aconitum ferox Wall. (एकोनाइटम
फेरॉक्स) । Fam. Ranunculaceae (रेनन्क्यूलेसी) ।
यह हिमालय की चोटियों पर, नेपाल तथा आसाम में उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-१-२ हाथ ऊँचा होता है।
पत्ते-करतलाकार एवं अनेक भागों में विभक्त होते हैं। पुष्प-लम्बे पुष्पडण्ड पर नीले पुष्प आते हैं। मूल-युग्म एवं
कंदसदृश होता है जिसमें नये वर्ष का कन्द १-११/५ इञ्च लम्बा २/५-३/५ इञ्च मोटा, अंडाकार आयताकार से लेकर
दीर्घवृत्ताकार, कुछ सूत्राकार उपमूलों से युक्त एवं तोड़ने पर कुछ पिष्टमय पीताभ होता है तथा पहले वर्ष का कन्द बहुत
सिकुड़ा हुआ एवं झुर्रीदार होता है। इसमें गन्ध नहीं होती और स्वाद में पहले मीठा और फिर कुछ कड़वा जान पड़ता
है। चबाने से थोड़ी देर बाद चिनचिनाहट और शून्यता मालूम होती है जो कुछ समय तक बनी रहती है।
वक्तव्य-भारत में एकोनाइट (Aconite) की २४ जातियाँ (Species) पाई जाती हैं। एकोनाइटम नेपेल्लस
(Aconitum napellus Linn.) जो ब्रिटिश फार्माकोपिया में मान्य है अपने यहाँ नहीं होता । उसका प्रतिनिधि ए.
चॅस्मेन्थमू है जिसका विस्तृत वर्णन आगे शृङ्गिक के अन्तर्गत किया गया है। यह ए. नेपेल्लस से अधिक वीर्यवाला होता