भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधात्वादिवर्गः ७६७
शिलाजीत की उत्पत्ति—ग्रीष्म ऋतु में धूप से तप्त होकर पर्वत धातुओं के सार भाग को गोंद की भाँति छोड़ते
हैं अर्थात् पर्वतों पर गर्मी में जो धातुओं का सार पिघल कर पत्थरों से निकलता है—उसे “शिलाजीत" कहते हैं। भेद-
(१) सौवर्ण (सोने का), (२) रजत (चांदी का), (३) ताम्र (तांबे का), (४) आयस (लोहे का) इस भाँति शिलाजीत
के ४ भेद हैं।
संस्कृत नाम-शिलाजतु, अद्रिजतु, शैलनिर्यास, गैरेय, अश्मज, गिरिज तथा शैलधातुज ये सब हैं।
शिलाजीत-कटु तथा तिक्त रस युक्त, पाक में कटु, रसायन, मलों का छेदन करने वाला, योगवाही एवम्-कफ,
प्रमेह, पथरी, शर्करा, मूत्रकृच्छ्र, क्षय, श्वास, बादी बवासीर, पाण्डुरोग, अपस्मार, उन्माद, शोथ, कुष्ठ तथा उदर के क्रिमि
इन सबों को नष्ट करने वाला होता है। [७८-८२]
अथ गुणलक्षणसहिताँस्तद्भेदानाह
सौवर्णं तु जपापुष्पवर्णं भवति तद्रसात् । मधुरं कटु तिक्तं च शीतलं कटुपाकि च ।।८३।।
रजतं पाण्डुरं शीतं कटुकं स्वादुपाकि च । ताम्रं मयूरकण्ठाभं तीक्ष्णमुष्णं च जायते ।।८४।।
लौहं जटायुपक्षाभं सतिक्तं लवणं भवेत् । विपाके कटुकं शीतं सर्वश्रेष्ठमुदाहृतम् ।।८५।।
सौवर्ण (सोने का) शिलाजीत के लक्षण-यह जपा (अढ़ौल) के पुष्प के समान लाल वर्ण का होता है।
सौवर्णशिलाजीत-यह मधुर, कटु तथा तिक्त रस युक्त, विपाक में कटु रस युक्त तथा शीतल होता है।
रजत (चाँदी का) शिलाजीत के लक्षण-यह पाण्डुर वर्ण का होता है। रजत शिलाजीत-यह कटु रस
युक्त, विपाक में मधुर रस युक्त तथा शीतल होता है।
ताम्र (ताँबे का) शिलाजीत के लक्षण-यह मयूर के कण्ठ के समान वर्ण वाला होता है। ताम्रशिलाजीत-
यह तीक्ष्ण तथा उष्ण होता है।
लौह (लोहे का) शिलाजीत के लक्षण-यह जटायु (गिद्ध) के पक्ष के सदृश वर्ण वाला होता है। लौह
शिलाजीत-यह तिक्त तथा लवण रसयुक्त, विपाक में कटु रस युक्त तथा शीतल होता है और यही सर्वश्रेष्ठ होता
है। [८३-८५]
अथ रसः । तत्र रसशब्दस्य निरुक्तिमाह
रसायनार्थिभिर्लोकैः पारदो रस्यते यतः। ततो रस इति प्रोक्तः स च धातुरपि स्मृतः ।।८६।।
रस शब्द की निरुक्ति-रसायन को चाहने वाले लोग इस पारे का सेवन (भक्षण) करते हैं इससे यह ‘रस’
कहलाता है। और शरीर का पोषण करने से 'धातु' भी कहलाता है अर्थात् रस तथा धातु पद से पारे का बोध किया
जाता है। [८६]
अथ पारदः । तस्योत्पत्तिं भेदानाह
शिवाङ्गात्प्रच्युतं रेत: पतितं धरणीतले। तद्देहसारजातत्वाच्छुक्लमच्छमभूच्च तत् ।।८७।।
क्षेत्रभेदेन विज्ञेयं शिववीर्यं चतुर्विधम् । श्वेतं रक्तं तथा पीतं कृष्णं तत् तु भवेत्क्रमात् ।।
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्च खलु जातितः ।।८८।।
श्वेतं शस्तं रुजां नाशे रक्तं किल रसायने। धातुवादे तु तत्पीतं खे गतौ कृष्णमेव च ।।८९।।
पारे की उत्पत्ति-श्री शिवजी के अंग से स्खलित होकर जो वीर्य पृथ्वी पर गिरा वही ‘पारा' हुआ। और देह के
सारभाग (वीर्य) से उत्पन्न होने से वह सफेद तथा स्वच्छ हुआ। भेद-क्षेत्रभेद से शिववीर्य (पारा) चार प्रकार का होता