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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 815

७६४ भावप्रकाशनिघण्टुः
कान्तलौह—गुल्म, उदररोग, अर्श, शूल, आम, आमवात, भगन्दर, कामला, शोथ, कुष्ठ, क्षय, प्लीहा,
अम्लपित्त, यकृत् तथा शिर के रोग इत्यादि सभी रोगों को निःसन्देह दूर करता है और शरीर में बल, वीर्य की वृद्धि तथा
पुष्टि करता है एवम् अग्निवर्द्धक होता है। [४८-५१]
अथ किट्टी। तस्या नामगुणानाह
ध्मायमानस्य लोहस्य मलं मण्डूरमुच्यते।
लोहसिंहानिका किट्टी सिंहानञ्च निगद्यते। यल्लोहं यद्गुणं प्रोक्तं तत्किट्टमपि तद्गुणम् ।।५२।।
किट्टी के लक्षण—लोह को अग्नि में धौंकाने से जो मल निकलता है उसे मण्डूर (किट्टी) कहते हैं। संस्कृत
नाम—लोहसिंहानिका, किट्टी, सिंहान तथा मण्डूर ये सब हैं।
किट्टी—जिस लोहे के जो गुण हैं उसके मेल (किट्टी) के भी वे ही गुण होते हैं।
अथोपधातवः। तेषां संख्यामाह
सप्तोपधातवः स्वर्णमाक्षिकं तारमाक्षिकं। तुत्थं कांस्यं च रीतिश्च सिन्दूरञ्च शिलाजतुः ।।५३।।
उपधातुओं की संख्या—(१) सोनामाखी, (२) रूपामाखी, (३) तूतिया, (४) काँसा, (५) पीतल, (६) सिन्दूर,
(७) शिलाजीत ये सात उपधातु हैं। [५३]
❖ उपधातवः—गौणा धातवः ।।५३।।
यहाँ पर “उपधातु” से “गौणधातु” यह अर्थ समझना चाहिये। [५३]
अथोपधातुष्वपि तत्तत्प्रधानधातुगुणाः स्वल्पमात्रया सन्तीत्याह
उपधातुषु सर्वेषु तत्तद्धातुगुणा अपि। सन्ति किन्त्वेषु ते गौणास्तत्तदंशाल्पभावतः ।।५४।।
उपर्युक्त सभी उपधातुओं में जिनके जो प्रधान धातु हैं उनके भी गुण उनमें रहते हैं किन्तु प्रधान के गुण गौणभाव
से (थोड़ी मात्रा में हों) रहते हैं क्योंकि—धातु का अंश उपधातु में बहुत थोड़ा रहता है। [५४]
तत्र सुवर्णमाक्षिकम् (सोनामाखी)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह
स्वर्णमाक्षिकमाख्यातं तापीजं मधुमाक्षिकम् ।।५५।।
ताप्यं माक्षिकधातुश्च मधुधातुश्च स स्मृतः। किञ्चित्सुवर्ण साहित्यात्स्वर्णमाक्षिकमीरितम् ।।५६।।
उपधातुः सुवर्णस्य किञ्चित्स्वर्णगुणान्वितम्। तथा च काञ्चनाभावे दीयते स्वर्णमाक्षिकम् ।।५७।।
किन्तु तस्यानुकल्पत्वात्किञ्चिदूनगुणास्ततः। न केवलं स्वर्णगुणा वर्त्तन्ते स्वर्णमाक्षिके ।।५८।।
द्रव्यान्तरस्य संसर्गात्सन्त्यन्येऽपि गुणा यतः। सुवर्णमाक्षिकं स्वादु तिक्तं वृष्यं रसायनम् ।।५९।।
चक्षुष्यं वस्तिरुक्कुष्ठपाण्डुमेहविषोदरान्। अर्शः शोथं विषं कण्डूं त्रिदोषमपि नाशयेत् ।।६०।।
सोनामाखी के संस्कृत नाम—स्वर्णमाक्षिक, तापीज, मधुमाक्षिक, ताप्य, माक्षिकधातु और मधुधातु ये सब हैं।
सोनामाखी—थोड़े सोने की भी मिलावट होने से किंचित् सोने के गुणों से युक्त 'सोनामाखी' को सोने का उपधातु
कहते हैं। तथा सोने के अभाव में इसे देते भी हैं किन्तु सोने का अनुकल्प होने से इसमें सोने की अपेक्षा कम गुण रहता
है और इसमें केवल सोने के ही गुण नहीं रहते हैं किन्तु दूसरे भी द्रव्यों का संयोग होने से अन्यों के भी गुण रहते हैं।
सोनामाखी मधुर तथा तिक्त रसयुक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), रसायन, नेत्रों के लिए हितकर एवं-बस्ति (मूत्राशय) सम्बन्धी
रोग, कुष्ठ, पाण्डु, प्रमेह, विष, उदररोग, अर्श, शोथ, खुजली तथा त्रिदोषनाशक है। [५५-६०]
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