भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 813, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें७६२ भावप्रकाशनिघण्टुः
अथ सीसस्य गुणानाह
सीसं रङ्गगुणं ज्ञेयं विशेषान्मेहनाशनम् ।।३६।।
नागस्तु नागशततुल्यबलं ददाति व्याधिं विनाशयति जीवनमातनोति ।
वह्निं प्रदीपयति कामबलं करोति मृत्युं च नाशयति सन्ततसेवितः सः ।।३७।।
सीसा—सीसा गुणों में राँगा के समान ही है किन्तु विशेषतः यह प्रमेह नाशक होता है। और यदि निरन्तर सेवन
किया जाय तो नाग (सीसा) सौ नाग (हाथी) के समान बल देता है, व्याधि नाश करता है, जीवन की वृद्धि करता है,
जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, कामदेव सम्बन्धी बल को बढ़ाता है तथा मृत्यु को भी नष्ट करता है अर्थात् अनियत विपाक
वाले मृत्यु को भी नष्ट करता है अर्थात् अनियत विपाक वाले मृत्यु से रक्षा करता है । [ ३६-३७]
अथाशुद्धवङ्गनागयोर्दोषानाह
पाकेन हीनौ किल वङ्गनागौ कुष्ठानि गुल्मांश्च तथाऽतिकष्टान् ।
कण्डूप्रमेहानिलसादशोथभगन्दरादीन् कुरुतः प्रयुक्तौ ।।३८।।
अशुद्ध वंग (राँगा) तथा सीसा के दोष—भलीभाँति से यदि भस्म न किये गये हों तो प्रयोग करने से राँगा तथा
सीसा ये दोनों कुष्ठ-गुल्म, अत्यन्त कष्ट, खुजली, प्रमेह, वायुरोग, शरीर का अवसन्न होना, शोथ, भगन्दर आदि रोगों
को उत्पन्न करते हैं । [ ३८]
अथ लोहम् । तस्योत्पत्तिं नामानि चाह
पुरा लोमिनदैत्यानां निहतानां सुरैर्युधि । उत्पन्नानि शरीरेभ्यो लोहानि विविधानि च ।।
लोहोऽस्त्री शस्त्रकं तीक्ष्णं पिण्डं कालायसायसी ।।३९।।
लोहा की उत्पत्ति—पहले समय में एक बार युद्ध में देवताओं द्वारा मारे हुये लोमिन नामक दैत्यों के शरीर से
अनेक प्रकार के लोहा उत्पन्न हुये ।
लोहा के संस्कृत नाम—लोह (यह स्त्रीलिङ्ग को छोड़ कर अन्य सभी लिङ्गों में होता है), शस्त्रक, तीक्ष्ण, पिण्ड,
कालायस तथा अयस् ये सब हैं । [ ३९]
अथ लोहस्य सप्तदोषानाह
गुरुता दृढतोत्क्लेदः कश्मलं दाहकारिता। अश्मदोषः सुदुर्गन्धो दोषाः सप्तायसस्य तु ।।४०।।
लोहा के सात-सात दोष—गुरुता, दृढ़ता, उत्क्लेद (वमन होने के समान मालूम होना), कश्मल (मूर्च्छा), दाह
उत्पन्न करना, खान में रहने से पत्थर सम्बन्धी दोष, अत्यन्त दुर्गन्ध ये सब हैं । [ ४०]
अथ लोहगुणानाह
लोहं तिक्तं सरं शीतं मधुरं तुवरं गुरु। रूक्षं वयस्यं चक्षुष्यं लेखनं वातलं जयेत् ।।४१।।
कफं पित्तं गरं शूलं शोथार्शः प्लीहपाण्डुताः । मेदोमेहक्रिमीन् कुष्ठं तक्किटं तद्वदेव हि ।।४२।।
लोहा के गुण—लोहा-तिक्त-मधुर तथा कषायरस युक्त, सारक, शीतल, गुरु, रूक्ष, आयु को स्थिर रखने वाला,
नेत्रों के लिये हितकर, लेखन गुण विशिष्ट, वातजनक एवम्-कफ-पित्त-विष-शूल-शोथ, अर्श, प्लीहा, पाण्डु, मेद,
प्रमेह, क्रिमि तथा कुष्ठ को दूर करनेवाला होता है। लोहा के किट्ट (मैल) के गुण—लोहकिट्ट के भी गुण लोहे के समान
ही होते हैं । [४३]
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA