भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 810, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंधात्वादिवर्गः ७५९
चाँदी की उत्पत्ति—त्रिपुरासुर के वध के लिए क्रोध से युक्त होकर शिवजी निर्निमेष-दृष्टि से जब उसे देखने लगे
तब उसी समय उनके एक नेत्र से अग्नि निकली उससे अग्नि के समान रुद्र भगवान् प्रज्वलित हो उठे और दूसरे बाएँ
नेत्र से आँसू की बूंदें निकलीं उन्हीं से चाँदी की उत्पत्ति हुई, जिसका वैद्यक शास्त्रानुकूल कर्म में उपयोग लेना
चाहिये। [१६]
अथ कृत्रिमरूप्योत्पत्तिमाह
कृत्रिमं च भवेत्तद्धि वङ्गादिरसयोगतः ॥१७॥
कृत्रिम (बनावटी) चाँदी की उत्पत्ति—कृत्रिम चाँदी उसे कहते हैं जो कि—वङ्ग आदि ने पारा का योग करने
से तैयार की जाती है। [१७]
अथ रूप्यनामान्याह
रूप्यं तु रजतं तारं चन्द्रकान्ति सितप्रभम् ॥१८॥
चाँदी के संस्कृत नाम—रूप्य, रजत, तार, चन्द्रकान्ति तथा सितप्रभ ये सब हैं। [१८]
अथोत्तमाधमयो रूप्ययोर्लक्षणान्याह
गुरु स्निग्धं मृदु श्वेतं दाहे छेदे घनक्षमम् । वर्णाढ्यं चन्द्रवत्स्वच्छं रूप्यं नवगुणं शुभम् ।।
कठिनं कृत्रिमं रूक्षं रक्तं पीतदलं लघु। दाहच्छेदघनैर्नष्टं रूप्यं दुष्टं प्रकीर्तितम् ॥१९॥
उत्तम चाँदी के लक्षण—जो चाँदी तौल में भारी, स्निग्ध, कोमल, तपाने तथा काटने में सफेद, घन की चोट
को सहने वाली अर्थात् टुकड़े-टुकड़े न होने वाली, उत्तम वर्णवाली, चन्द्रमा के समान स्वच्छ कान्ति युक्त होती है अर्थात्
इन नव गुणों से युक्त होती है वह उत्तम समझी जाती है।
निकृष्ट चाँदी के लक्षण—जो चाँदी कठिन, कृत्रिम (बनावटी), रूक्ष, लाल, पीले दल (जोर) वाली, तौल में
हल्की, तपाने, काटने तथा घन की चोट मारने पर जो अलग-अलग बिखर जाने वाली होती है वह खराब समझी जाती
है। [१९]
अथ सम्यङ्मारितरूप्यगुणानाह
रूप्यं शीतं कषायाम्लं स्वादुपाकरसं सरम् । वयसः स्थापनं स्निग्धं लेखनं वातपित्तजित् ।
प्रमेहादिकरोगांश्च नाशयत्यचिराद् ध्रुवम् ॥२०॥
अच्छी तरह से शुद्धकर भस्म किये हुये चाँदी के गुण—चाँदी भस्म—कषाय, अम्ल तथा मधुर रस युक्त
एवम्—विपाक में भी मधुर रस युक्त, शीतल, सारक, युवावस्था को स्थिर रखने वाला, स्निग्ध, लेखन एवम्—वात—
पित्त तथा प्रमेहादि रोगों को शीघ्र तथा निश्चित रूप से दूर करने वाला है। [२०]
अथासम्यङ् मारितरूप्यदोषानाह
तारं शरीरस्य करोति तापं विध्वंसनं यच्छति शुक्रनाशम् ।
वीर्य बलं हन्ति तनोश्च पुष्टिं महागदान्पोषयति ह्यशुद्धम् ॥२१॥
बिना अच्छी तरह से शोधी हुई एवम् कच्ची चाँदी के भस्म के दोष—अशुद्ध चाँदी शरीर को संतप्त तथा नष्ट
करने वाली, शुक्रनाशक एवम्-शरीर के वीर्य, बल तथा पुष्टि को नष्ट करने वाली और महारोगों की वृद्धि करने वाली
होती है। [२१]