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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 745

६९४ भावप्रकाशनिघण्टुः
गुण और प्रयोग—इसकी छाल का क्वाथ वातानुलोमक एवं प्रतिदूषक होता है। इसे कामला, पैत्तिक ज्वर एवं
योषापस्मार में दिया जाता है। कर्णस्राव तथा विषाक्त व्रण प्रक्षालन के लिये भी इसका उपयोग करते हैं।
इसके पत्र उत्तेजक एवं स्तम्भन माने जाते हैं। भूतबाधा एवं ग्रह दोष में इसका धूप दिया जाता है।
मात्रा—क्वाथ ५ से १० तोला; चूर्ण १-३ माशा।
अथ पलाशः (ढाक) । तस्य नामानि गुणांश्चाह
पलाशः किंशुकः पर्णी यज्ञियो रक्तपुष्पकः। क्षारश्रेष्ठो वातपोथो ब्रह्मवृक्षः समिद्वरः ॥४९॥
पलाशो दीपनो वृष्यः सरोष्णो व्रणगुल्मजित् । भग्नसंधानकृद् दोषग्रहण्यर्शः क्रिमीन् हरेत् ।।
कषायः कटुकस्तिक्तः स्निग्धो गुदजरोगजित् ॥५०॥
ढाक के संस्कृत नाम—पलाश, किंशुक, पर्ण, यज्ञिय, रक्तपुष्पक, क्षारश्रेष्ठ, वातपोथ, ब्रह्मवृक्ष तथा समिद्वर
ये सब हैं।
ढाक—कषाय, कटु तथा तिक्त रस युक्त, अग्निदीपक, वृष्य (वीर्यवर्धक), सारक, उष्ण, टूटी अस्थियों को जोड़ने
वाला, स्निग्ध एवम्-व्रण, गुल्म, वातादिक दोष, ग्रहणी, अर्श (बबासीर), क्रिमि तथा गुदा में उत्पन्न होने वाले रोगों को
दूर करता है। [४८-५०]
अथ तत्पुष्पफलयोर्गुणानाह
तत्पुष्पं स्वादु पाके तु कटु तिक्तं कषायकम् ॥५१॥
वातलं कफपित्तास्रकृच्छ्रजिद ग्राहि शीतलम्। तृड्दाहशमकं वातरक्तकुष्ठहरं परम् ॥५२॥
फलं लघूष्णं मेहार्शःकृमिवातकफापहम्। विपाके कटुकं रूक्षं कुष्ठं गुल्मोदरप्रणुत् ॥५३॥
ढाक के फूल—स्वादिष्ट, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, विपाक में कटु रस युक्त, वातजनक, कफ-पित्त, रक्तविकार
तथा मूत्रकृच्छ्रनाशक, ग्राही, शीतल, तृषा और दाह को शमन करने वाले एवम् वातरक्त तथा कुष्ठ को अत्यन्त दूर करने
वाले होते हैं।
ढाक के फल—लघु, उष्ण, विपाक में कटु रस युक्त, रूक्ष एवम्-प्रमेह, अर्श, कृमि, वात, कफ, कुष्ठ, गुल्म
तथा उदररोग के नाशक हैं। [५१-५३]
२७. ढाक
हिं०—ढाक, पलाश, परास, टेसू। बं०—पलाश गाछ। म०—पलस। गु०—खाखरो। मु०—खाकरो। क०—
मुत्तग। ते०—मोदुगु । ता०—पलासु । अं०—The Forest flame (दि फॉरेस्ट फ्लेम) । ले०—Butea frondosa
Koen. ex Roxb. (ब्यूटिया फ्रॉण्डोसा) । Fam. Leguminosae (लेग्यूमूनोसी) ।
यह अत्यन्त शुष्क भागों को छोड़कर प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है और इसको वाटिकाओं में भी रोपण करते
हैं।
इसके वृक्ष—छोटे या मध्यम ऊँचाई के होते हैं तथा समूहों में रहते हैं। पत्ते—त्रिपत्रक होते हैं। पत्रक—१० से
२० से० मी० चौड़े, कर्कश, ऊपर से कुछ चिकने किन्तु नीचे मृदु रोमश तथा उभरी हुई शिराओं से युक्त होते हैं। अग्र
पत्रक तिर्यगायताकार, वृन्त की तरफ कुछ पतला या अभि अंडाकार, कुण्ठिताग्र या खण्डिताग्र एवं बगल के तिर्यक्
अंडाकार होते हैं। पुष्प—बड़े, सुन्दर, नारंग रक्तवर्ण के होते हैं जो प्रायः पत्रहीन शाखाओं पर एकसाथ बहुत होते हैं।
स्वरूप में ये दूर से सुग्गे की चोंच की तरह मालूम होने से इसे किंशुक कहा जाता है। फली—१२.५-२० × २.५-