भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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१५. खैर
हिं०-खैर, कत्था। बं०-खयेर गाछ। म०-खैर, काय। गु०-खेर, काथो। ते०-चंद्र। ता०-करंगालि।
अं०-Black Catechu (ब्लैक कॅटेच्यू)। ले०-Acacia catechu Willd (अॅकेसिया कटेच्यू)। Fam.
Leguminosae (लेग्युमिनोसी)।
यह भारत में अनेक स्थानों पर होता है। पंजाब, उत्तर पश्चिम हिमालय, मध्यभारत, बिहार, गंजम, कोंकण एवं
दक्षिण में विशेष रूप से शुष्क जंगलों में होता है।
इसका वृक्ष-मध्यम प्रमाण का, काँटेदार होता है। छाल-गहरे धूसराभ भूरे रंग की, १/२ इञ्च मोटी एवं लम्बे
परतों में छूटने वाली तथा अन्दर से भूरी या लाल होती है। शाखाएँ-पतली होती हैं। काँटे युग्म, टेढ़े, चमकीले भूरे
या काले एवं ये उपपत्रों के रूपान्तर होते हैं। पत्र-१०-१५ से० मी० लम्बे एवं वृन्त पर काँटे तथा ४-५ ग्रन्थियाँ
होती हैं। उपपक्ष २०-६०, ३.८-५ से० मी० लम्बे होते हैं। पत्रक प्रत्येक उपपक्ष पर ६०-१०० की संख्या में, ४.५-
६ x १.२५ मि० मी० बड़े, रेखाकार तथा अवृन्त होते हैं। पुष्प-छोटे, श्वेताभ या हलके पीले, ५-१० से० मी०
लम्बी मंजरियों में आते हैं। आभ्यन्तर कोश बाह्य कोश से लगभग दूना रहता है। फली-५-७.५ से० मी० लम्बी,
१-१.६ से० मी० चौड़ी, चिपटी, पतली, धूसर, चमकीली एवं उसका अग्र नोकीला त्रिकोणाकार एवं मूल संकुचित
होकर ३-६ मि० मी० लम्बा, नाल सदृश हो गया रहता है। बीज-३-१० की संख्या में रहते हैं। इसके अन्य भेदों
का वर्णन स्वतन्त्र किया गया है।
कुछ पुराने वृक्षों के काष्ठ के अन्दर दरारों में एक रवेदार या चूर्ण रूप में कृष्णाभ श्वेत पदार्थ जमा पाया जाता
है जिसे खदिरसार (खेरसाल) कहते हैं। यह बहुत महँगा होता है तथा खाँसी एवं गले के विकारों में काम में आता
है।
खैर के सार (अन्दर की लकड़ी) भाग को जल के साथ उबालकर कत्था निकालते हैं जो प्रधान रूप से दो प्रकार
का होता है। प्रथम धूसर रंग का खाने के या औषध के काम आता है तथा दूसरा लाली लिये भूरा या हलका नारंगी
विभिन्न उद्योगों में, एक तीसरा प्रकार बम्बई की तरफ सुपाड़ी से बनाया हुआ भी मिलता है। एक चौथा कत्था विदेशी
वृक्ष अंकेरिया गम्बीर (Uncaria gambir Roxb. Fam. Rubiaceae) से प्राप्त होता है।
रासायनिक संगठन-इसके अन्दर की लकड़ी में कैटेचिन (Catechin) एवं कैटेचूटैनिक ॲसिड (Catechu-
tannic acid) होते हैं जिनमें से इसका कषायत्व दूसरे वाले द्रव्य के कारण होता है जो कत्थे में करीब ५०% होता
है।
गुण और प्रयोग-खैर शीत, ग्राही, कफ, शुक्र को सुखाने वाला, रक्तपित्त-प्रशमन एवं पाचन है। इसका प्रयोग
कुष्ठ, चर्मरोग, खाँसी तथा गला, मुख, मसूढ़े की शिथिलता, अतिसार, प्रमेह, रक्तविकार एवं व्रण में किया जाता है।
कत्थे में भी यही गुण हैं।
(१) कुष्ठ में इसको खिलाते हैं तथा इससे स्नानादि भी कराते हैं।
(२) संग्रहणी, अतिसार तथा खट्टी डकार में कत्था उपयोगी है।
(३) खाँसी विशेष रूप से शुष्क कास में इसको मुँह में चूसने के लिये देते हैं। कफ युक्त खाँसी में इससे कफ
कम होता है।
(४) मसूढ़े से खून आता हो तो इसके क्वाथ से कुल्ला कराते हैं।
(५) मुख में छाले पड़ गये हों तब कत्थे को चूसने को देते हैं।
मात्रा-त्वक् चूर्ण १ से ३ माशा; कत्था ३ से ६ रत्ती; क्वाथ ५ से १० तोला।