भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 728, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंवटादिवर्गः ६७७
७. पाकर
हिं०-पाकर, पाखर, पिलखन, पकरिया, पकरी। बं०-पाकी, पाकुर। म०-पाईट, पिंपरी वृक्ष। गु०-पीप,
पीपर। क०-बसारी। ते०-जुब्बि। ता०-कुरुगु। ले०-Ficus infectoria Roxb. (फाइकस् इन्फेक्टोरिया)।
Fam. Moraceae (मोरेसी)।
यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है।
पाकर के वृक्ष-बड़, पीपर के समान जंगल और ग्रामों में बड़े-बड़े होते हैं। पत्ते-४-५ इञ्च लम्बे, आम के पत्तों
के समान पर इनसे चौड़े होते हैं। इनकी शाखायें सघन और छाया उत्तम होती है। फल-पत्तों के डंडियों पर छोटे-
छोटे पीपर वृक्ष के फल के समान लगते हैं। ये पकने पर सफेद या कुछ लाल एवं बिन्दुकित होते हैं।
गुण और प्रयोग-यह शीत, व्रणरोपक, रक्तपित्तघ्न एवं योनिरोग नाशक हैं।
इसकी छाल का क्वाथ गण्डूष, व्रणप्रक्षालन एवं डूश के लिए काम में लाया जाता है।
अथ शिरीषः (सिरस)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह
शिरीषो भण्डिलो भण्डी भण्डीरश्च कपीतनः। शुकपुष्पः शुकतरुर्मृदुपुष्पः शुकप्रियः ॥१३॥
शिरीषो मधुरोऽनुष्णास्तिक्तश्च तुवरो लघुः। दोषशोथविसर्पघ्नः कासव्रणविषापहः ॥१४॥
सिरस के संस्कृत नाम-शिरीष, भण्डिल, भण्डी, भण्डीर, कपीतन, शुकपुष्प, शुकतरु, मृदुपुष्प और शुकप्रिय
ये सब हैं।
सिरस-मधुर, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, किञ्चित् उष्ण, लघु एवम्-वातादिक दोष, शोथ, विसर्प, कास
(खाँसी), व्रण तथा विष को दूर करने वाला है। [१३-१४]
८. सिरस
हिं०-सिरस, सिरिस। बं०-शिरीषगाछ। म०-शिरस, चिचोला। गु०-सरसडो, काकीयो सरस। क०-
वागेमर। ते०-दिरसन। ता०-वाकै। ले०-Albizzia lebbeck Benth. (आल्बीजिया लेबेक्)। Fam.
Leguminosae (लेग्युमिनोसी)।
यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है तथा लगाया भी जाता है।
सिरस के वृक्ष-बड़े-बड़े और सघन होते हैं। पत्ते-इमली के पत्तों के समान, उपपक्ष (Pinnae) २ से ४ जोड़े;
पत्रक-३/४-२ १/४ इञ्च लम्बे, ६ से ८ जोड़े, तिर्यक् कड़े एवं छोटे वृन्त से युक्त होते हैं। प्रधान पर्णवृन्त के आधार
पर एक बड़ी ग्रन्थि होती है। पुष्प-सवृन्त, हरिताभ पीत, मुण्डक (Heads) में आते हैं। फली-६ से १२ इञ्च लम्बी,
३/४-१ १/२ इञ्च चौड़ी, पतली, हलके पीले रंग की होती है जिनमें ६-१० बीज होते हैं।
इसके वृक्ष से एक प्रकार का बबूर के गोंद के समान गोंद निकलता है जो पानी में डालने से गल जाता है।
नोट-शीरीष की एक अन्य जाति होती है जिसे ले०-आ० ऑडोरेटिस्सिमा (A. odoratissima), काला
शिरीष कहते हैं। इसमें उपपक्ष २ से ५ जोड़े; पत्रक १/२- १ १/४ इञ्च लम्बे, ६ से २४ जोड़े वृन्तहीन होते हैं। इसमें
प्रधान पर्णवृन्त तथा ऊपर के १-२ उपपक्ष के वृन्त के आधार पर ग्रन्थि होती है। पुष्प-धूसर, अवृन्त एवं सशाख मुण्डक
में आते हैं। फली-६-१२ इञ्च लम्बी, १-१ १/४ इञ्च चौड़ी, पारभासक या चमकीली एवं ८-१२ बीजों से युक्त होती
है।